

कोई नेहरू का योगदान नहीँ था 💥💪



वे देश के अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक थे. कई बातें संदेह पैदा करती हैं कि क्या वाकई उनकी मौत सामान्य थी. ऐसे सवालों के जवाब तो नहीं मिल सके, लेकिन देश ने बहुत ही नाजुक मौके पर अपना महान वैज्ञानिक को जरूर खो दिया था.
आज भारत की वैज्ञानिक उन्नति के बारे में बात करते हुए इसरो का जिक्र ना करना विषय को अधूरा ही रखना है. पिछले कई दशकों से इसरो ने ऐसी उपलब्धियां हासिल की हैं जो दुनिया में किसी देश को हासिल नहीं है. लेकिन इसरो जैसी संस्था की अवधारणा इसकी स्थापना के कई साल पहले ही इसके संस्थापक और भारत के महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई ने पूरी कर ली थी. आज देश उन्हें उनकी पुण्यतिथि पर याद जरूर करने लगा है. उनकी मृत्यु के समय की स्थितियां बहुत सामान्य सी थीं, उस वक्त देश में महौल ऐसा था कि डॉ साराभाई की मौत से कई तरह के सवाल पैदा हो गए थे।
कैसे थे उनकी मौत के समय के हालात।
आगे बता रहा हू ध्यान देना
30 दिसंबर 1971 को हमारा देश पाकिस्तान को युद्ध में परास्त कर चुका था और उस समय बंगलादेश एक नया राष्ट्र बन चुका था।भारत परमाणु अप्रसार संधि पर विचार कर रहा था. लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि अगले दिन अखबार यह दुखद समाचार देश भर को दे रहे होंगे कि डॉ विक्रम साराभाई की मौत हो गई है.
तिरुवनंतपुरम में हुई थी
डॉ साराभाई की मौत तिरुवनंतपुरम के कोवलम बीच के उनके पसंदीदा रिसॉर्ट में हुई थी. उस समय उन्हों ने रूसी रॉकेट का प्रक्षेपण देखा था और थुम्बा रेलवे स्टेशन का उद्घाटन करने के बाद आराम कर रहे थे, जिसके बाद वे तिरुवनंतपुरम से बंबई रवाना होने वाले थे.
उनकी कलाम से भी हुई थी बातचीत
30 दिसंबर को ही साराभाई को स्पेस लॉन्च व्हीकल की डिजाइन की समीक्षा भी करनी थी. रवाना होने से एक घटें पहले उन्हें डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से टेलीफोन से बातचीत की थी और इस बातचीत के एक ही घंटे के भीतर 52 साल के साराभाई की मौत हो गई थी. बताया जाता है कि उनकी मौत हृदयाघात से हुई थी.
लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनके जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की मौत की भी कोई जांच नहीं की गई थी. उनके नजदीकी सहयोगी पद्मनाभन जोशी बताते हैं कि फ्लाइट में उनके पास वाली सीट भी हमेशा खाली रखी जाती थी. और यदि किसी वजह से उन्हें ट्रेन से यात्रा करनी पड़ती थी तो एक पूरी टीम उनके साथ रखी जाती थी.पहले से बीमार भी नहीं थे डॉ साराभाई
अपनी मौत के एक दिन पहले तक डॉ साराभाई ने मशहूर आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरिया से समुद्र में उनके साथ तैरने का वादा किया था, जो उस समय कोवलम पैलेस पर काम कर रहे थे. इसके बाद वैज्ञानिकों से मिलते और फिर उन्हें अपने परिवार के साथ नया साल मनाने के लिए अहमदाबाद के लिए बंबई से होते हुए रवाना होना था.
अब प्रश्न उठता है कि पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ?
डॉ साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई ने अपने पिता पर लिखी किताब में लिखा है कि
“हमें उनका पोस्टमार्टम कराने का कोई कारण दिखाई नहीं दिया.”
वहीं उनके पुत्र कार्तिकेय साराभाई का कहना था कि पोस्टमार्टम ना कराने का फैसला उनकी दादी डॉ साराभाई की मां का था.
मौत से पहले विक्रम साराभाई को किसी भी तरह की स्वास प्रॉब्लम भी नही थी
12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में पैदा होने वाले साराभाई के प्रयासों से ही 1969 में भारत के इसरो की स्थापना हुई. वे इसरो के पहले चेयरमैन थे. नेहरू नही विक्रम साराभाई ने ही भारत सरकार को इस बात के लिए मनाया कि भारत अपना खुद का अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करे. उनके योगदान के कारण ही उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक या पिता कहा जाता है.