
“पिंड अमरीका”
क्या अमरीका पिंड गांव या अमरीका का गांव निर्माता ही निर्णय नही ले सकता अपने लक्ष को कि क्या दिखाए
क्या विषय बनाए
ऐतिहासिक घटना या अमेरिका काल्पनिक उड़ान “उड़ दा पंजाब या उड़ दा पंजाबी संस्कार”
क्या अब अच्छे अभिनेताओं और अच्छी कहानियों की कमी नहीं है?
अब हमें सोचना और विचार करना होगा.?.पंजाबी गणित की पंजाबी फिल्में सफल क्यों नहीं हो रही हैं?
क्या पटकथा पर मेहनत नहीं हो रही?
2 क्या अनुभवहीन निर्देशक हैं?
क्या प्रोड्यूसर बिना समझे काम ले रहे हैं और आंखें बंद करके पैसे दे रहे हैं?
क्या फिल्म बनाने के बहाने कबूतरबाज़ी की जाती है?
क्या भारत के काले धन को सफेद करने का कोई तरीका है?
कहीं कोई समस्या तो जरूर है, जिस पर विचार करना जरूरी है?
हमें पता चला है कि पंजाबी फिल्म उद्योग में 80% जुआरी हैं, जो नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, न ही उनके पास कोई शिक्षा है, लेकिन वे चीजें बेच सकते हैं, हर बार उन्हें नए “एनआरआई निर्माता” मिल जाते हैं, जो फिल्में बनाते हैं। कोशिश करते हैं, अपनी जेबें भरते हैं, फिल्म फ्लॉप होने के बाद निर्माता फिल्मों से तौबा कर लेते हैं, और जुगरू लोग फिर नये निर्माता की तलाश में लग जाते हैं, बस यही क्रम लगातार चलता रहता है? इसलिए नहीं आ रही अच्छी फिल्में? यदि इससे नए निर्माताओं को मदद मिलती है तो आप यहां लिखकर अपना अनुभव हमारे साथ साझा कर सकते हैं..!!
केवल 20% लोग ही अनुभवी, मेहनती और अच्छा काम करने वाले हैं और केवल उन्हीं की फिल्में सफल हो रही हैं? पंजाबियत के बारे में सोचने के लिए कुछ किसी के पास कुछ नही..!!
जैसे पंजाबी पिंड को प्रवासी भारतीय बना रहे या समझ रहे है कनेडा,अमरीका,।
वहीं अपनी मिट्टी से जुड़े पंजाबी उसी पिंड को अमरीका , कनेडा नही नर्क गिन ने लगे है जैसे महत्त्व पूर्ण विषयों पर पंजाबी सिनेमा जगत की कोई रुचि ही नही लगती।
जिस पंजाब के भारत ने चंद्र यान , सूर्य यान बनाए उससे अच्छी कौनसी शिक्षा है जैसे प्राप्त करने को पूरा पंजाब ही अमेरिका कनेडा को भाग रहा है जैसे मुद्दों से भटक कर आज “पंजाबी फिल्मों” के सत्र को मुद्दे हीन फिल्मे बनानी ही क्यों पड़ रही है क्या पंजाब के “सामाजिक” मुद्दों पर फिल्मे बन ना बनद नही हो गई और अपने स्तर से नीचे की श्रेणी की फिल्मे हमे नही परोस रहा आज का “पंजाबी सिनेमा” अच्छे अभिनेताओं और अच्छी कहानियों की कमी नहीं है, अब हमें सोचना और विचार करना होगा.?.
की पंजाबी फिल्में सफल क्यों नहीं हो रही हैं?
कयों कि पटकथा पर मेहनत नहीं हो रही?
2 याअनुभवहीन निर्देशक हैं?
या फिर प्रोड्यूसर बिना समझे काम ले रहे हैं और आंखें बंद करके पैसे दे रहे हैं?
या फिर फिल्म बनाने के बहाने कबूतरबाज़ी की जाती है?
या फिर यह भारत के काले धन को सफेद करने का कोई तरीका है?
कहीं कोई समस्या है जरूर, जिस पर विचार करना बहुत जरूरी है?
हमें पता चला है कि पंजाबी फिल्म उद्योग में 80% जुआरी हैं, जो नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, न ही उनके पास कोई शिक्षा है, लेकिन वे चीजें बेच सकते हैं, हर बार उन्हें नए एनआरआई निर्माता मिल जाते हैं, जो फिल्में बनाते हैं। कोशिश करते हैं, अपनी जेबें भरते हैं, फिल्म फ्लॉप होने के बाद निर्माता फिल्मों से तौबा कर लेते हैं, जुगरू लोग फिर नये निर्माता की तलाश में लग जाते हैं, बस यही क्रम लगातार चलता आ रहता है? इसी लिए नहीं आ रही अच्छी फिल्में? यदि इस से किसी नए निर्माताओं को मदद मिलती है तो आप यहां लिखकर अपना अनुभव हमारे साथ साझा कर सकते हैं..!!
“उड़ता पंजाब” विषय मिल जाता है
परंतु नही मिलता की भारत जहां की पडाई पढ़े लोग चंद्र यान सूर्य यान बना विश्व में अपना अपने देश का नाम चमकाते हैं उसी देश का नौजवान पड़ाई के नाम पर अमरीका _कनेडा क्यों जारहा है यह तो कोई मुद्दा ही नही ऐसा पंजाबी फिल्म निर्माताओं को क्यों लगता है?
भारतीय प्रवासियों को पंजाब अमरीका कनेडा क्यों लगता है?
भी कोई मुद्दा नहीं नजर आता जिन पर कोई पंजाबी फिल्म ना बन ना पंजाबी फिल्मों के गिरते ग्राफ को स्पष्ट करती है। हो सकता है आप भी ऐसे कटु सत्य का साथ ना देना चाहे!!
केवल 20% लोग ही अनुभवी, मेहनती और अच्छा काम करने वाले हैं और केवल उन्हीं की फिल्में सफल हो रही हैं? के बारे में सोचने के लिए कुछ विचार तो बनता है कि नही..!!