सना सईद 🎂जन्म 22 सितंबर 1988 एक भारतीय अभिनेत्री और मॉडल हैं, जो बॉलीवुड फिल्मों में दिखाई देती हैं। वह पहली बार कुछ कुछ होता है (1998) में एक बाल कलाकार के रूप में दिखाई दीं और हर दिल जो प्यार करेगा (2000) और बादल (2000) फिल्मों में ऐसा करना जारी रखा। वह बाबुल का आंगन छूटे ना (2008) और लो हो गई पूजा इस घर की (2008) जैसे टेलीविजन शो में भी दिखाई दीं। 2012 में, सईद ने करण जौहर की फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर में सहायक भूमिका में एक वयस्क के रूप में अपनी शुरुआत की, जो बॉक्स-ऑफिस पर व्यावसायिक सफलता के रूप में उभरी। वह झलक दिखला जा (2013), नच बलिए (2015) और फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी (2016) सहित कई रियलिटी शो में दिखाई दी हैं। भारतीय अभिनेत्री और मॉडल है,जो बॉलीवुड फिल्मों में दिखाई देती है। वह सबसे पहले कुछ कुछ होता है (1998) में एक बाल कलाकार के रूप में दिखाई दीं और हर दिल जो प्यार करेगा (2000) और बादल (2000) में ऐसा करना उन्होंने जारी रखा। वह टेलीविजन कार्यक्रमों में भी दिखाई दीं जैसे बाबुल का आंगन छूटे ना (2008) और लो हो गई पूजा इस घर की (2008)। 2012 में, सना ने करण जौहर की स्टुडेंट ऑफ़ द ईयर में सहायक भूमिका में एक वयस्क के रूप में अपने फ़िल्म करियर की शुरुआत की। फ़िल्म बॉक्स ऑफिस व्यावसायिक सफलता के रूप में उभररी थी। वह झलक दिखला जा (2013), नच बलिए (2015) और फीयर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी (2016) सहित कई रियलिटी कार्यक्रमों में दिखाई दी है।
पंजाबी अभिनेत्री पति राज मसंद बच्चे1बेटा नाम स्काई
रंजीता कौर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत ऋषि कपूर के साथ फिल्म लैला मजनू (1976) में की थी। इसके बाद, उन्होंने पति पत्नी और वो ( संजीव कुमार के साथ ) और अंखियों के झरोखों से ( सचिन के साथ ) जैसी व्यावसायिक रूप से सफल फिल्मों में अभिनय किया । उन्होंने सुरक्षा , तराना , हमसे बढ़कर कौन , आदत से मजबूर , बाजी और गुनाहों का देवता जैसी फिल्मों में मिथुन चक्रवर्ती के साथ एक शानदार टीम बनाई । में उन्होंने अमिताभ बच्चन की नायिका की भूमिका निभाईसत्ते पे सत्ता . उनकी बहन रूबीना एक मैं और एक तू में राजीव टंडन ( रवीना टंडन के भाई) के साथ दिखाई दीं। कौर राजश्री परिवार से जुड़ी थीं और उनकी कई सफल फिल्मों में काम किया था। उन्होंनेकई फिल्मों में ऋषि कपूर , सचिन , राज बब्बर , राज किरण , दीपक पाराशर , विनोद मेहरा और अमोल पालेकर के साथ अभिनय किया और मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी जोड़ी बनी। फिल्म इंडस्ट्री से बाहर निकलने से पहले उनकी आखिरी फिल्म गुनाहों का देवता थी1990 में। 1990 के दशक के मध्य में वह कुछ टेलीविजन धारावाहिकों में दिखाई दीं और फिर अभिनय से दूरी बना ली। 15 साल बाद वह अंजाने: द अननोन (2005) से फिल्मों में लौटीं । 2008 में उन्होंने जिंदगी तेरे नाम में अभिनय किया , जिसमें उन्हें मिथुन चक्रवर्ती के साथ फिर से जोड़ा गया। 2012 में फिल्म की रिलीज में देरी हुई। 2011 में वह अंखियों के झरोखों से की अगली कड़ी ‘ जाना पहचान’ में सचिन के साथ फिर से नजर आईं ।फिल्म
📽️ 1976 लैला मजनू 1978 अंखियों के झरोखों से 1978 दामाद 1978 पति पत्नी और वो 1979 मेरी बीवी की शादी 1979 भयावह 1979 जो कि सुरक्षा 1979 तराना 1980 आप तो ऐसे ना थे 1980 यूनीस मधुमक्खियाँ 1980 ख्वाब 1981 अरमान 1981 धुआँ 1982 राजपूत 1982 उस्तादी उस्ताद से 1982 सत्ते पे सत्ता 1982 सुन सजना 1982 तेरी कसम 1982 हथकड़ी 1983 हादसा 1983 कौन? कैसी? 1983 मेहदी 1983 मुझे इन्साफ चाहिए 1983 वो जो हसीना 1984 बाजी 1984 राज तिलक सपना 1986 किस्मतवाला 1986 Qatl 1989 क़ैदी करो 1989 गवाही 1990 दीवाना मुझ सा नहीं 1990 गुनाहों का देवता 2005 अंजाने: द अननोन 2011 जाना पहचान 2012 जिंदगी तेरे नाम 1981 दर्द 1981 हम से बढ़कर कौन 1981 क्रोधी
अज़रा जन्म21सितम्बरमुम्बई अभिभावक पिता- नानूभाई वक़ील, माता- सरोजिनी। कर्म भूमि भारत कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा मुख्य फ़िल्में ‘मदर इण्डिया’, ‘जंगली’, ‘गंगा यमुना’, ‘भारत की बेटी’, ‘संसार नैया’, ‘दीपक महल’, ‘संस्कार’, ‘ताजमहल’, ‘नया ज़माना’ और ‘सर्कस किंग’ आदि। प्रसिद्धि भारतीय अभिनेत्री 1958 में अज़रा जी की फ़िल्म ‘टैक्सी 555’ प्रदर्शित हुई। प्रदीप कुमार और शकीला की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फ़िल्म में वह सहनायिका थीं। 1959 में बनी फ़िल्म ‘घर घर की बात’ में वे नायिका बनीं। इस फ़िल्म का निर्माण उनके मौसा और सलीम शाह के पिता रमणीकलाल शाह ने किया था। दिल्ली के रहने वाले शेख इमामुद्दीन और उनकी पत्नी मुनव्वर जहां के सात बच्चों में से दो बेटियां रोशनजहां उर्फ़ रानी और उनसे छोटी इशरतजहां 1930 और 1940 के दशक की फ़ैंटेसी फ़िल्मों की स्टार अभिनेत्रियां थीं। रोशनजहां का स्क्रीननेम ‘सरोजिनी’ था। साल 1934 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘दीवानी’ से फ़िल्मों में कदम रखने वाली सरोजिनी ने क़रीब 12 साल के कॅरियर में ‘भारत की बेटी’, सुंदरी’, ‘मधु बंसरी’, ‘संसार नैया’, ‘सन ऑफ़ अलादीन’, ‘दीपक महल’, ‘हातिमताई की बेटी’, ‘जादुई कंगन’, ‘संस्कार’, ‘जादुई बंधन’, ‘ताजमहल’, ‘फ़रमान’, ‘नया ज़माना’, ‘श्रीकृष्णार्जुन युद्ध’ और ‘सर्कस किंग’ जैसी फ़िल्मों में काम किया। उसी दौरान उन्होंने फैंटेसी फ़िल्मों के लिए मशहूर निर्माता-निर्देशक नानूभाई वक़ील के साथ गुप्त विवाह भी कर लिया था। अज़रा इन्हीं सरोजिनी और नानूभाई वक़ील की बेटी हैं। अज़रा जी के पिता नानूभाई वकील का निधन 19 दिसम्बर 1980 को हुआ और उनकी मां सरोजिनी 1993 में गुज़रीं। उधर ‘इंदुरानी’ के नाम से 1936 में बनी मराठी फ़िल्म ‘सावित्री’ से कॅरियर शुरू करने वाली इशरतजहां ने अगले 12 सालों में ‘बुलडॉग’, ‘मेरी भूल’, ‘मि.एक्स’, ‘सुनहरा बाल’, ‘भेदी कुमार’, ‘चश्मावाली’, ‘मिडनाईट मेल’, ‘स्वास्तिक’, ‘हातिमताई की बेटी’, ‘जादुई कंगन’, ‘थीफ़ ऑफ़ तातार’, ‘अलादीन लैला’, ‘बुलबुले बग़दाद’, ‘ताजमहल’ और ‘ज़ेवर’ जैसी कई फ़िल्में कीं। इंदुरानी का विवाह निर्माता-निर्देशक रमणीकलाल शाह से हुआ था। सलीम शाह इन्हीं इंदुरानी के बेटे हैं। अजरा छठवीं तक की पढ़ाई सांताक्रुज़ के सेंट टेरेसा कॉन्वेन्ट हाईस्कूल से की और फिर साल 1950 में मैं अपनी नानी के पास दिल्ली चली गयी। क़रीब 5 साल दिल्ली में रहकर उन्होंने पहाड़ी भोजला-चितलीक़बर-जामा मस्जिद के सेंट फ़्रांसिस स्कूल से स्कूली पढ़ाई पूरी की और फिर 1954-1955 में वापस मुम्बई लौट आयी।”
नाम राजन हक्सर पति/पत्नी मनोरमा कर्म भूमि मुम्बई कर्म-क्षेत्र अभिनेता और निर्माता मुख्य फ़िल्में ‘दो भाई’, ‘आखिरी संघर्ष’, बंजारन’ और ‘हीर-रांझा नागरिकता भारतीय अन्य जानकारी राजन हक्सर अपने कॅरियर के शिखर पर सत्तर से अस्सी के दशक में ही रहे, जब डकैतों, तस्करों, जुआरियों की भूमिकाएं बहुतायत में लिखी गईं। राजन हक्सरहिंदी सिनेमा के चरित्र अभिनेता थे। सत्तर और अस्सी के दशक की फ़िल्मों में बेहद सक्रिय रहे राजन हक्सर ने लगभग पचास वर्षो तक फ़िल्मों को अपनी सेवाएं दीं। राजन हक्सर ने अपने कॅरियर में पिता, चाचा, मछुआरे, ट्रस्टी, डॉक्टर, वकील, ग्रामीण, ठाकुर तथा इंस्पेक्टर की कई भूमिकाएं अदा कीं, मगर उनकी असली पहचान सह-खलनायक के रूप में ही स्थापित हुई। तस्कर, डाकू तथा अवैध बार-मालिक के रूप में इनके किरदार ही दर्शकों के जेहन में बसे। परिचय राजन हक्सर अपने मित्र चंद्रमोहन के सहयोग से शूटिंग के दौरान ही चरित्र अभिनेत्री मनोरमा से संपर्क में आए और दोनों ने विवाह कर लिया। लगभग 20 साल तक विवाह में रहने के बाद दोनों अलग हो गए। दोनों की बेटी रीता हक्सर ने भी सन सत्तर के अंतिम सालों में कुछ फ़िल्में बतौर अभिनेत्री के रूप में की। आशानुरूप सफलता न मिलने के कारण उन्होंने विवाह के बाद फ़िल्में छोड़ दी। फ़िल्मी कॅरियर मुख्य लेख : राजन हक्सर का फ़िल्मी कॅरियरराजन हक्सर ने आजादी के साल में आई फ़िल्म ‘दो भाई’ से अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत करते हुए नब्बे के दशक तक फ़िल्मों में की। 1997 में आई वर्षो से लंबित फ़िल्म ‘आखिरी संघर्ष’ इनकी अंतिम प्रदर्शित फ़िल्म थी। फिर भी ‘बंजारन’ और ‘हीर-रांझा’ (1992) में राजन छोटे-मोटे रोल में नजर आए। वह अपने कॅरियर के शिखर पर सत्तर से अस्सी के दशक में ही रहे जब डकैतों, तस्करों, जुआरियों की भूमिकाएं बहुतायत में लिखी गईं। अंतिम समय नब्बे का दशक आते-आते, फ़िल्मों के चरित्र कलाकारों की भरमार हो गयी। धारावाहिकों के अदाकार फ़िल्मों के चरित्र भूमिकाओं पर हावी हो गए। ऐतिहासिक कथानक वाली इक्का दुक्का फ़िल्मों में ही राजन दिखें, मगर फिर उम्र और स्वास्थ्य कारणों के चलते वे फ़िल्मों से दूर होते चले गए।
प्रसिद्ध अभिनेत्री टीवी कलाकार प्रिया तेंदुलकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि जन्म की तारीख और समय: 19 अक्तूबर 1954, भारत मृत्यु की जगह और तारीख: 19 सितंबर 2002, मुंबई पति करन राजदान (विवा. 1988–2002) भाई: सुषमां तेंदुलकर, राजा तेंदुलकर माता-पिता:
विजय तेंदुलकर, निर्मला तेंदुलकर भारत की पहली टीवी स्टार प्रिया तेंडुलकर ने अनेक फिल्मों व टीवी धारावाहिकों में भूमिका निभाई पर संभवतः वे संपूर्ण जीवन अपने सबसे पहले टीवी अवतार “रजनी” के नाम से ही बेहतर पहचानी जाती रहीं। 1985 में निर्मित व बासू चटर्जी द्वारा निर्देशित इस धारावाहिक में उन्होंने भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ बेखौफ आवाज़ उठाने वाली एक साधारण गृहणी का किरदार निभाया था। वह लेखिका भी थी। प्रिया प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंडुलकर की सुपुत्री थीं। उनका जन्म 19 अक्टुबर, 1954 को हुआ, उनकी दो बहनें और एक भाई था। प्रिया का विवाह अभिनेता व लेखक करण राजदान से 1988 में हुआ। पर यह विवाह सात साल ही चल सका और इसके बाद उनका संबंध विच्छेद हो गया। करण व प्रिया ने “रजनी” और “किस्से मियाँ बीवी के” धारावाहिकों में पती पत्नी के वास्तविक जीवन के किरदार भी निभाये। 1974 में श्याम बेनेगल की फिल्म अंकुर में निभाई भूमिका के कारण प्रिया के अभिनेता अनंत नाग से भी संबंध जोड़े जाते रहे। प्रिया का प्रारंभ से ही अभिनय की और झुकाव था। 1939 में जब वे स्कूल में थीं, उन्होंने सत्यदेव दुबे के निर्देशन तले गिरीश कर्नाड के लिखे पौराणिक नाटक “हयवदन” में गुड़िया की भूमिका निभाई। इस नाटक में निर्देशिका कल्पना लाज़मी उनकी सह कलाकार थीं। इसके बाद पिग्मेलियन, अंजी, कमला, कन्यादान, सखाराम बाइंडर, ती फूलराणी, एक हठी मुलगी जैसे अनेकों मराठी नाटकों में उन्होंने भूमिकायें कीं। प्रिया ने टीवी पर जहाँ गुलज़ार निर्देशित स्वयंसिद्ध जैसे नारीवादी धारावाहिक में काम किया वहीं “हम पाँच” जैसे हास्य धारावाहिक में फोटो फ्रेम से बोलती मृत बीवी की भूमिका भी अदा की और “द प्रिया तेंडुलकर शो” और “ज़िम्मेदार कौन” जैसे सफल टॉक शो भी किये जिसमें वे काफी आक्रामक तेवर के लिये जानी जाती थीं। अंकुर, मोहरा और त्रिमूर्ती जैसी कुछ हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया पर कोई उल्लेखनीय भूमिकायें नहीं। शायद “रजनी” के किरदार और अपने पिता का ही प्रभाव था कि प्रिया सामाजिक मुद्दों के प्रति सदा जागरूक रहीं। उनका व्यक्तित्व खुला और साहसी था। “द प्रिया तेंडुलकर शो” की बुलंदी पर शिवसेना समेत कई राजनीतिक दलों ने उन्हें अपने दल में शामिल करने का प्रयास किया पर वे मन नहीं बना पाईं। वे स्वयं लघु कथायें लिखती रहती थीं। ज्याचा त्याचा प्रश्न, जन्मलेला प्रत्येकला, असंही व पंचतारांकित उनकी कुछ कृतियाँ हैं, जिनमें से कुछ पुरस्कृत भी हुईं। 19 सितंबर, 2002 में 47 वर्ष की अल्पायु में उनका हृदयाघात से देहांत हो गया। वे कुछ समय कैंसर से भी लड़ती रहीं। प्रसिद्ध_फिल्में 1974 – अंकुर 1978 – देवता 1983 – माहेरची मानसे, रानीने दाव जिंकाला 1984 – गोंघळत गोंधळ 1985 – मुम्बईचा फौजदार, रजनी (टीवी धारावाहिक) 1987 – कालचक्र 1988 – किस्से मियाँ बीवी के (टीवी धारावाहिक) 1989 – एक शून्य (टीवी धारावाहिक) 1990 – घर (टीवी धारावाहिक) 1994 – मोहरा 1995 – त्रिमूर्ति 1996 – द प्रिया तेंदुलकर शो (टीवी टॉक शो) 1997 – और प्यार हो गया, ज़िम्मेदार कौन (टीवी टॉक शो), गुप्त, हम पाँच (टीवी धारावाहिक) 2000 – राजा को रानी से प्यार हो गया 2001 – प्यार इश्क और मुहब्बत
सुनील सिकंद स्क्रीन नाम सुनील सिकंद के रूप में जन्मे सुनील सिकंद पेशा फ़िल्म निर्देशक आयु (वर्तमान) 73 🎂जन्म 19 सितंबर 1949 जन्म (शहर) बम्बई (अब मुंबई), महाराष्ट्र जन्म (देश) भारत राष्ट्रीयता भारतीय पिता प्राण (अभिनेता) माँ शुक्ल शिखंड पति-पत्नी अलग हो गए ज्योति सिकंद 1982 बेटा सिद्धार्थ सिकंद उल्लेखनीय कार्य (हिन्दी फ़िल्में) [दूसरी इकाई के निदेशक के रूप में] अमर अकबर एंथनी (1977), धरम वीर (1977), परवरिश (1977), सुहाग (1979), फरिश्ता (1984) उल्लेखनीय कार्य (हिन्दी फ़िल्में) [निर्देशक के रूप में] लक्ष्मणरेखा (1991) सुनील सिकंद अहलूवालिया एक भारतीय फिल्म निर्देशक और अनुभवी अभिनेता प्राण के बेटे हैं। उन्होंने अपनी पहली फिल्म 1984 में फरिश्ता और दूसरी फिल्म 1991 में लक्ष्मणरेखा निर्देशित की, जिसमें जैकी श्रॉफ, नसीरुद्दीन शाह, शम्मी कपूर, डैनी डेन्जोंगपा और उनके पिता प्राण ने अभिनय किया था।सुनील सिकंद
indo-canadian mudar: प्रसिद्ध गीतकार,शायर हसरत जयपुरी के की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि 🎂जन्म 15 अप्रैल 1922, जयपुर ⚰️मृत्यु: 17 सितंबर 1999, मुंबई बहन: कोसर जहां इनाम: फिल्म फेयर पुरस्कार _ सर्व श्रेष्ठ गीत कार जन्म नाम: इकबाल अहमद मसऊदी कला के क्षेत्र में विरासत मिलना बहुत आम है लेकिन, बड़े कलाकार वही बन पाते हैं जो विरासत को सजाने-संवारने में ठीक वैसी ही मशक्कत करते हैं जैसे कोई नया शागिर्द करे. यह बात गीतकार हसरत जयपुरी के लिए भी कही जा सकती है. जयपुर में 15 अप्रैल, 1918 को जन्मे इकबाल हुसैन उर्फ़ हसरत जयपुरी को शायरी विरासत में मिली थी. उनके नाना फ़िदा हुसैन फ़िदा मशहूर शायर थे. लेकिन शेरो-शायरी को अपनी महबूबा की तरह अपने साथ टिकाये रखने के लिए हसरत को जो जद्दोजहद करनी पड़ी वह हर एक के लिए मुमकिन न थी. यह अलग बात है कि शायरी तो उनके जीवन में टिकी रही पर महबूबा या महबूबाएं नहीं. वह 1940 का दौर था. कई अन्य महत्वपूर्ण गीतकारों, संगीतकारों और फिल्मकारों की तरह हसरत जयपुरी का भी आगमन फिल्म जगत में हुआ था. ‘बरसात’ फिल्म के बाद का वह कालखंड हसरत जयपुरी की जिंदगी का स्वर्णिम काल था जब उन्होंने ‘आह’, ‘अराउंड द वर्ल्ड’, ‘श्री 420’ और ‘मेरा नाम जोकर’ के गीतों से धूम मचा दी थी. एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिट्टी के खिलौने बेचने वाले से फैक्ट्री में मजदूरी करने और इस मजदूरी से लेकर आरके बैनर तले आने तक का हसरत जयपुरी का सफ़र बड़ा दिलचस्प है अहसानमंदी और गैरतमंदी हसरत जयपुरी के व्यक्तित्व के दो सबसे मजबूत पक्ष थे. वे राज कपूर से लेकर अपने जयपुर के बालपन के मित्रों तक के ताउम्र आभारी रहे. राजकपूर ने उन्हें फिल्मों में पहला ब्रेक दिया था तो बाकी दोस्तों ने इससे पहले उनके गुरबत के दिनों में मुंबई आने के किराए से लेकर जूते-चप्पल और कपड़ों तक की व्यवस्था की थी. और इस अहसान को उन्होंने एक फ़िल्मी सिचुएशन में ही सही, पर क्या खूब अदा किया -‘अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो…’ उनके गैरतमंद होने की बात को कुछ यूं समझा जा सकता है कि राज कपूर की मृत्यु के बाद उनके लिए 5000 रुपये का वजीफा तय किया गया था लेकिन, इसे लेने का उनका मन नहीं हुआ तो नहीं हुआ. एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिट्टी के खिलौने बेचने वाले से लेकर फैक्ट्री में मजदूरी करने और इस मजदूरी से लेकर आरके बैनर तले आने तक का हसरत जयपुरी का सफ़र बड़ा दिलचस्प है. हसरत ने जितने मन से गीत और शायरी लिखी, उतनी ही दिलचस्पी से वे अपने हर छोटे-बड़े कामों को भी निभाते रहे. जयपुर से मुंबई आने के बाद के आठ साल तक चले बस कंडक्टरी के सफ़र को हसरत बड़े ही दिलचस्प ढंग से और मोह से भरकर लगभग हर इंटरव्यू में याद करते थे. इसकी भी एक खास वजह थी. हसरत जयपुरी खूबसूरत चेहरों के कायल थे और हसीन शक्लों के दीदार के लिए बस से बेहतर जगह और कौन सी हो सकती थी! इनमें वे अपनी जयपुर में छूट चुकी खूबसूरत प्रेमिका राधा के अक्स तलाशते फिरते. यहां उनके भीतर के शायर को भरपूर खाद-पानी मिलता रहता. वे दिन भर बस में कंडक्टरी करते और रातों को जागकर उन हसीन चेहरों की याद में गजलें लिखते. सबसे दिलचस्प बात यह कि बस में चढ़ने वाली खूबसूरत सवारियों से उन्होंने कभी किराया नहीं लिया. शायद इसलिए कि उन शक्लों को देखकर उपजने वाले गीत अमूल्य हुआ करते थे. पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में हसरत जयपुरी को अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते हुए सुना था. इसी के बाद उन्होंने राज कपूर को उनका नाम सुझाया था फिल्म गीतकार होने से बहुत पहले हसरत एक मुकम्मल शायर थे. और उनकी यही खूबी उनको प्रतिष्ठित आरके बैनर में शामिल करने का सबब बनी. पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में उन्हें अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते सुन लिया था. इसे उन्होंने अपने साथ फुटपाथ पर रात बिताने वाले मित्र की मृत्यु पर लिखा था. उन्होंने ही राज कपूर को मशविरा दिया कि हसरत बहुत अच्छा गीत लिखते हैं और वे चाहें तो उन्हें आरके बैनर में शामिल कर सकते हैं. इसके बाद राज कपूर ने उनकी शायरी सुनी. फिर उस लोकगीत पर आधारित धुन शंकर जयकिशन के माध्यम से उन्हें सुनवाई जिसके बोल थे – ‘अमुवा का पेड़ है, वही मुंडेर है. आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है.’ धुन में बंध लिखने की हसरत जयपुरी की यात्रा यहीं से शुरू हुई. इसी तर्ज पर उनका पहला गीत तैयार हुआ – ‘जिया बेकरार है, छाई बहार है, आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है.’ हसरत के लिए फिल्मों में गीत लिखने की यह शुरुआत थी लेकिन गीत-गजल वे इससे पहले भी लिख रहे थे. इन सब में प्रेम के अलग-अलग रंगों को अलग अंदाज में पिरोया गया था. उनके ये सारे गीत-गजल गायकों की पहली पसंद तो बने ही बने फिल्मों में भी उनका प्रयोग धड़ल्ले से होता रहा – ‘ऐ मेरी जाने गजल, चल मेरे साथ ही चल’, ‘जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते’, ‘हम रातों को उठ-उठ के जिनके लिए रोते हैं’ और ‘नजर मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा सी जाती हो’, जैसे खूब प्रसिद्ध हुए गीत-गजल इसका पुख्ता उदाहरण हैं. खुद उन्होंने भी पहले से अपनी लिखी कविताओं और गीतों का प्रयोग फिल्मों में खूब किया. मुंबई आने से पहले की अपनी कथित प्रेमिका ‘राधा’ के लिए लिखा पहला प्रेम पत्र – ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढ़कर…’ जहां संगम फिल्म की जान बना, वहीं तबके नौजवानों के लिए उनके प्रेम का मेनिफेस्टो जैसा कुछ भी. बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. इसी फिल्म के दूसरे गाने ‘ मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का…’ में बाकायदा उस पूरे परिदृश्य और नाम ‘राधा’ का भी इस्तेमाल गया. इन गीतों को सुनें तो ऐसा लगता है मानो हसरत ने अपनी जिंदगी के हर क्षण को करीने से संजोकर रखा था और जब भी मौका मिला तो उसे गीत में बदल दिया. इसका एक और उदाहरण बेटे अख्तर के जन्म के बाद उसके लिए लिखा गया गया प्यारा सा गीत –‘तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को…’ है. विदेश की किसी पार्टी में किसी को देखकर उनके मन में अचानक ही यह खयाल भी आया था – ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए’. हसरत जयपुरी किसी खास तरह के गाने या फिर खाने के लेखक नहीं थे. उनके पास न साहिर वाली तल्खी थी, न फैज या कैफ़ी वाली गहराई. हां दिलकशी और जिंदादिली भरपूर थी. जिंदगी के बहुत कटु और निम्न कहे जाने वाले जीवन अनुभव थे. यहां घोर कलात्मकता नहीं थी पर वह सादादिली और दिलकशी थी जो कड़वे से भी मीठा कुछ निकाल लेती है. रूमानियत उनका सहज स्वभाव थी. हसरत जयपुरी के शोखी-शरारत भरे चुलबुले शब्द मुकेश की आवाज और राज कपूर की शख्सियत पर कुछ ऐसे फबते थे जैसे परदे पर कोई जादू सा साकार हो रहा हो. इस तिकड़ी में कोई ऐसा तिलिस्म था कि भाव, शब्द आवाज और अदाकारी एक हो जाते थे. उदाहरण के तौर पर – ‘हां मैंने भी प्यार किया…’, ‘ये चांद खिला, ये तारे हंसे…’ जैसे न जाने कितने गीत याद आते हैं. हसरत साहब की खासियत थी कि उनके एकल गीतों में भी यह जादू खोया नहीं. ‘आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें…’, ‘जाऊं कहां बता ऐ दिल…’, ‘दीवाना मुझ को लोग कहें…’, ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन समाई…’, ‘हम छोड़ चले हैं महफ़िल को..’ ये और ऐसे ही कई गीत हर दर्द और तकलीफ में हमें सहज ही याद आते हैं या इन्हें सुनते हुए हम अपनी तकलीफें याद कर लेते हैं. किसी भी धारा में बहकर और बटकर न लिखने वाला यह लेखक शब्दों से खेलते हुए किसी कुम्हार की तरह नए-नए प्रयोग रचता रहा. वह चाहे शब्दों में तोड़मोड़ हो या अपनी परंपरा से छूट लेकर किए जाने वाले प्रयोग. पहेलियों और लोक-कथाओं के आधार पर रचा गया ‘मेरा नाम जोकर’ का यह गीत – ‘तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर…’ या फिर ‘ईचक दाना बीचक दाना दाने ऊपर दाना…’ सब इसी नया गढ़ने का कौतुक थे. फिल्मी दुनिया में हसरत जयपुरी के बारे में एक धारणा बन गई थी वे जिस फिल्म का शीर्षक गीत लिखेंगे उसका बेशुमार सफल होना तय है यही नहीं जो शब्द अब तक कहीं अस्तित्व ही नहीं रखते थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर हसरत जयपुरी ने न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोल दी. क्या हममें से कोई, ‘रम्मैया वस्तावैया’ या फिर ‘शाहेखुबा’ या ‘जाने-जनाना’ का कोई मुकम्मल अर्थ जानता है? पर गीतों में ये शब्द सार्थक और सजीव हो जाते हैं. दाग के इस मिसरे – ‘तुम मेरे साथ होते हो, गोया कोई दूसरा नहीं होता’ में जब हसरत ‘शाहे खुबा’ और ‘जाने-जनाना’ का तड़का लगाते हैं तो वह कुछ और ही हुआ जाता है. शायद आम लोगों के हिस्से का कुछ. बाद इसके भी कभी जब कहीं शास्त्रीय रचने की जरूरत हुई तो – ‘अजहूं न आए बालमां, सावन बीता जाए…’ और ‘दाग न लग जाए…’ जैसे कई अविस्मरणीय गीत भी उनके ही खाते में आए फिल्मों के लिए शीर्षक गीत लिखना सबसे कठिन माना जाता है पर हसरत जयपुरी ने इस मुश्किल को कुछ इस सादगी से अंजाम दिया कि एक धारणा सी बन गई थी कि हसरत जिस फिल्म का शीर्षक गीत लिखेंगे उसका बेशुमार सफल होना तय है. यह बस यूं ही नहीं था.ऐसे गीतों का एक लंबा सिलसिला था जिसमें – दीवाना मुझको लोग कहें (दीवाना), दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), रात और दिन दिया जले (रात और दिन), एक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), दो जासूस करें महसूस (दो जासूस), एन ईवनिंग इन पेरिस (एन इवनिंग इन पेरिस) जैसे न जाने कितने गीत शामिल थे. 1971 तक आरके बैनर की यह मंडली (राज कपूर, हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन) बदस्तूर चलती रही. कहा जाता है कि एक ही म्यान में दो तलवारें कभी नहीं होती. संगीतकारों और फिल्म लेखकों की जोड़ियां बनना तो हमारे यहां परंपरा सरीखा है लेकिन आरके के बैनर की म्यान में दो गीत लेखकों (तलवारों) का साथ होना किसी अजूबे से कम नहीं था. शैलेंद्र और हसरत जयपुरी दोनों ही टक्कर के प्रतिभाशाली थे और हद दर्जे के संवेदनशील भी. राज कपूर की छतरी के अंदर और बाहर भी वे बार-बार आमने-सामने होते रहे. जैसे ‘हरियाली और रास्ता में’- ‘बोल मेरी तकदीर में क्या है… (हसरत)’, इब्तिदाये इश्क में हम… (शैलेन्द्र)’ , ‘अराऊंड दि वर्ल्ड’ में – ‘दुनिया की सैर कर लो… (शैलेन्द्र)’, ‘चले जाना जरा ठहरो…(हसरत)’. ‘संगम’ – ‘हर दिल जो प्यार करेगा…(शैलेन्द्र)’, ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढकर… (हसरत)’. ऐसे और भी मौके आए लेकिन इन दोनों के लिए यह गलाकाट प्रतिस्पर्धा नहीं थी. यदि हम इनके गीतों को देखों तो लगता है कि कहीं न कहीं दोनों ने एक दूसरे को और बेहतर लिखने के लिए ही प्रेरित किया होगा. यह रिश्ता किसी भी क्षेत्र के दो प्रतिस्पर्धियों के लिए एक आदर्श कहा जा सकता है. जो शब्द अब तक कहीं अस्तित्व ही नहीं रखते थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर हसरत जयपुरी ने न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोल दी, जैसे – रम्मैया वस्तावैया 1971 से इस चौकड़ी में बिखराव शुरू हो गया. शैलेन्द्र ने ‘तीसरी कसम’ बनाई लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली. शैलेंद्र इसी सदमे में चल बसे. फिर एक बीमारी के चलते जयकिशन की भी मौत हो गई. हसरत जयपुरी को इसका सबसे ज्यादा धक्का लगा. अब चुप्पी उन पर हावी होने लगी थी उधर ‘मेरा नाम जोकर’ की असफलता ने राज कपूर को भी हिलाया था पर वे फिर उठ खड़े हुए थे. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बक्षी की नई टीम बनाकर वे फिर फिल्मी दुनिया को रंगने लगे थे. मुकेश का जाना भी इसी दरम्यान हुआ. इस दौर में हसरत के शब्द जैसे चुक गए थे. ‘राम तेरी गंगा मैली’ का शीर्षक गीत उनके हाथ नहीं आया. इसके लिए उन्होंने ‘सुन साहिबा सुन…’ जरूर लिखा था. फिर तकरीबन दस साल के बाद उनके पास शीर्षक गीत लिखने का मौका आया. आरके स्टूडियो की फिल्म हिना के लिए उन्होंने ‘मैं हूं खुशरंग हिना…’ लिखा था. उनके लिखे तमाम शीर्षक गीतों की तरह इस फिल्म और गीत ने फिर कामयाबी का वही इतिहास दुहराया. बाद में भी उन्होंने कुछेक फिल्मों के लिए गाने लिखे लेकिन यह दौर उनका नहीं था. फिर भी जो कुछ वे अपने दौर में फिल्म संगीत के लिए लिख गए वह हमेशा कायम रहने वाला है. हसरत जयपुरी ने तीन दशक लंबे अपने सिने कैरियर में 300 से अधिक फिल्मों के लिये लगभग 2000 गीत लिखे। अपने गीतों से कई वर्षो तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला यह शायर और गीतकार 17 सिंतबर 1999 को संगीतप्रेमियों को अपने एक गीत की इन पंक्तियों …तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे… जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनाओगे .. की स्वर लहरियों में छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह दिया। पर
जसपाल भट्टी हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली, लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए. जन्म: 03 मार्च 1955, अमृतसर ⚰️मृत्यु: 25 अक्तूबर 2012, शाहकोट पत्नी: सविता भट्टी (विवा. 1985–2012) बच्चे: जसराज भट्टी, राबिया भट्टी माता-पिता: सरदार नरिंदर सिंह भट्टी, मंजित कौर कैलर
हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए. व्यंग-चित्रकार (कार्टूनिस्ट) जसपाल भट्टी, 80 के दशक के अंत में दूरदर्शन की नई प्रातःकालीन प्रसारण सेवा में उल्टा-पुल्टा कार्यक्रम के माध्यम से प्रसिद्ध हुए थे।उनके इस सबसे लोकप्रिय फ़्लॉप शो को उनकी उनकी पत्नी सविता भट्टी ने प्रोड्यूस किया साथ ही उसमें अभिनय भी किया| इस शो से इससे पहले जसपाल भट्टी चण्डीगढ़ में द ट्रिब्यून नामक अख़बार में व्यंग्य चित्रकार के रूप में कार्यरत थे। एक व्यंग्य चित्रकार होने के नाते इन्हे आम आदमी से जुड़ी समस्याओं और व्यवस्था पर व्यंग्य के माध्यम से चोट करने का पहले से अनुभव था। अपनी इसी प्रतिभा के चलते उल्टा-पुल्टा को जसपाल भट्टी बहुत रोचक बना पाए थे। 90के दशक के प्रारम्भ में जसपाल भट्टी दूरदर्शन के लिए एक और टेलीविज़न धारावाहिक, फ्लॉप शो लेकर आए जो बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके बाद जसपाल भट्टी को एक कार्टूनिस्ट की बजाय एक हास्य अभिनेता के रूप में जाना जाने लगा। 25 अक्टूबर 2012 को सुबह 3बजे जालंधर, पंजाब में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। ️ 2006 फ़ना 2005 कुछ मीठा हो जाये 2003 कुछ ना कहो 2003 तुझे मेरी कसम 2002 जानी दुश्मन 2002 कोई मेरे दिल से पूछे 2002 शक्ति 2002 ये है जलवा 2000 हमारा दिल आपके पास है 2000 खौफ़ 1999 जानम समझा करो 1999 काला साम्राज्य 1999 आ अब लौट चलें 1999 कारतूसजसपाल भट्टी
डॉ. मीता पंडित एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका और ग्वालियर घराने की प्रमुख प्रतिपादक हैं। वह कृष्णराव शंकर पंडित की पोती और शिष्या और लक्ष्मण कृष्णराव पंडित की बेटी हैं। वह अखंड वंशावली में छठी और परिवार की पहली महिला हैं जिन्होंने संगीत को पेशे के रूप में अपनाया है। 🎂जन्म14 सितंबर 1974 नई दिल्ली पति: रोहित मिश्रा माता-पिता: लक्ष्मण कृष्णराव पंडित, आभा पंडित मीता का जन्म नई दिल्ली, भारत में हुआ था। वह एक गृहिणी और पंडित आभा पंडित की बेटी हैं। लक्ष्मण कृष्णराव पंडित, ग्वालियर घराने के दिग्गज गायक और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता। उन्होंने अपना बचपन नई दिल्ली में बिताया, जहां उन्होंने उच्च माध्यमिक तक सेंट मैरी स्कूल में पढ़ाई की, और लेडी श्री राम कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक की डिग्री हासिल की । मीता ने अपने दादा पद्म भूषण पंडित से प्रशिक्षण शुरू किया । कृष्णराव शंकर पंडित और उनके पिता पं. एलके पंडित 3 साल की उम्र में। एक ऐसे घर में पली-बढ़ीं, जहां संगीत के उस्ताद और उनके पिता के शिष्य आए दिन आते थे, और सारी बातचीत संगीत के इर्द-गिर्द केंद्रित होती थी, वह बहुत कम उम्र से ही संगीत के बारीक पहलुओं से परिचित हो गईं। हालाँकि, एक किशोरी के रूप में, उसे अपने माता-पिता द्वारा संगीत की तुलना में अधिक स्थिर पेशा अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, मुख्य रूप से अनियमित काम के घंटों और एकल यात्राओं के कारण, जिससे यह एक महिला के लिए एक कठिन करियर विकल्प बन गया। वास्तव में उनके बड़े भाई तुषार पंडित को पारिवारिक विरासत को आगे ले जाने के लिए तैयार किया जा रहा था। वह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पीएचडी कर रहे थे जब 27 साल की उम्र में 1 सितंबर 1994 को नई दिल्ली में उनकी एक घातक सड़क दुर्घटना हुई। मीता, जो उस समय स्नातक की डिग्री हासिल कर रही थी और एमबीए की तैयारी कर रही थी , ने एमबीए करने का फैसला किया। उन्होंने विरासत को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और संगीत में मास्टर डिग्री हासिल करने के लिए आगे बढ़ीं। उन्होंने 27 साल की उम्र में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पीएचडी पूरी की । मीता ने मंच पर अपना पहला प्रदर्शन 9 साल की उम्र में अपने दादा पंडित द्वारा आयोजित 3 दिवसीय संगीत समारोह ‘प्रसंग’ के दौरान दिया था। कृष्णराव शंकर पंडित, भारत भवन , भोपाल । 15 साल की उम्र में, उन्होंने वाराणसी में संकट मोचन उत्सव में प्रदर्शन किया , जो भारत के सबसे बड़े वार्षिक शास्त्रीय संगीत और नृत्य उत्सव में से एक है। उन्होंने भारत और विदेश के लगभग सभी प्रमुख शास्त्रीय संगीत समारोहों में प्रदर्शन किया है, जिसमें 1999 और 2014 में प्रतिष्ठित सवाई गंधर्व भीमसेन महोत्सव , 2013 और 2019 में डोवर लेन संगीत सम्मेलन , कोलकाता और शामिल हैं।2011,2013 और 2019 में तानसेन समारोह , ग्वालियर ।और इस के बाद ।1995-2000 1995 और 2005 के बीच, मीता ने भारत और विदेशों में फ्रांस, जर्मनी, लंदन, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, रोम , संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और बांग्लादेश में प्रतिष्ठित समारोहों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया । नई दिल्ली में फ्रांसीसी दूतावास के एक विशेष प्रोजेक्ट के माध्यम से, वह 2003 में ” आर्टिस्ट इन रेजिडेंस ” के रूप में तीन महीने के लिए पेरिस में रहीं। वहां उन्होंने एक इंडो-फ़्रेंच प्रोजेक्ट के एक भाग के रूप में जैज़ पियानोवादक , एली डेल्फ़ौ के साथ सहयोग किया। उन्होंने 2004 में इस्लामाबाद में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान में भारत के सांस्कृतिक राजदूत के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट और प्रसार भारती ने एक फिल्म बनाई जिसका शीर्षक था – “मीता: लिंकिंग ए ट्रेडिशन विद टुडे” – जो 2005 में एक गायिका के रूप में उनके जीवन और विकास का दस्तावेजीकरण करती है। 2008 में, मीता ने वर्ल्ड स्पेस सैटेलाइट रेडियो पर “स्वर श्रृंगार” नामक एक संगीत प्रशंसा श्रृंखला प्रस्तुत की। उन्होंने एम्स्टर्डम स्थित तबला वादक, हेइको डिज्कर के साथ “द ल्यूमिनेंस प्रोजेक्ट” नामक एल्बम में सहयोग किया। यह एल्बम 2012 में लॉन्च भी किया गया था।
मलकीत सिंह पंजाबी भांगड़ा सिंगर 🎂जन्म:13 सितंबर 1962 जन्मस्थान:हुसैनपुर, पंजाब, भारत जीवनसाथी:हरबंस कौर सिंह मलकीत सिंह (सिंह) भारतीय फिल्म उद्योग में काम करने वाले एक गायक हैं जिनका जन्म 13 सितंबर 1962 को हुआ था। सिंह की शादी हरबंस कौर सिंह से हुई और उनकी एक बेटी है। सिंह ने होम रन (2011) और मॉनसून वेडिंग (2001) जैसी हिंदी फिल्मों में योगदान दिया। उन्होंने 2008 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय सम्मान सहित कई पुरस्कार और सम्मान जीते हैं। मलकीत सिंह बोपाराय; एक इंग्लैंड स्थित पंजाबी भांगड़ा गायक हैं। हुसैनपुर में जन्मे और नकोदर में पले-बढ़े, वह 1984 में बर्मिंघम चले गए। सिंह पहले पंजाबी गायक थे जिन्हें बकिंघम पैलेस में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा एमबीई से सम्मानित किया गया था । वह “गुर नालो इश्क मीठा”, “तूतक तूतक तूतियां”, “कुर्री गरम जाये”, “देख ली विलायत”, “चल हुन” और “जिंद माही” गानों के लिए सबसे प्रसिद्ध थे। मलकीत सिंह एमटीवी चैनल, चैनल वी और सभी भारतीय चैनलों पर कई भारतीय टॉक शो में दिखाई दिए थे जो सिख धर्म और पंजाब से जुड़े थे। अपने 32 साल के करियर में 4.9 मिलियन से अधिक रिकॉर्ड की बिक्री के साथ, उन्हें गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स द्वारा अब तक के सबसे अधिक बिकने वाले भांगड़ा एकल कलाकार के रूप में सूचीबद्ध किया गया था ।वीर रहीमपुरी द्वारा लिखित उनका गीत “तूतक तूतक तूथियां” उस समय का सबसे तेजी से बिकने वाला और सबसे सफल भांगड़ा एकल था। इसे 1990 के एल्बम तूतक तूतक टूथियन के साथ रिलीज़ किया गया था , जिसने 2.5 मिलियन रिकॉर्ड बेचे, जो उस समय भांगड़ा इंडी-पॉप के लिए एक रिकॉर्ड था।