सिद्धार्थ शुक्ला

सिद्धार्थ शुक्ला
एक भारतीय अभिनेता, होस्ट और मॉडल थे, जो हिंदी टेलीविजन और फिल्मों में दिखाई दिए। उन्हें ब्रोकन बट ब्यूटीफुल 3, बालिका वधू और दिल से दिल तक में उनकी भूमिकाओं के लिए जाना जाता था। वह रियलिटी शो बिग बॉस 13 और फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी 7 के विजेता के रूप में उभरे।
🎂जन्म की तारीख और समय: 12 दिसंबर 1980, मुम्बई
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 2 सितंबर 2021, मुम्बई
इनाम: गोल्डन पेटल पुरस्कार – पसंदीदा जोड़ी, ज़्यादा
माता-पिता: रीता शुक्ला, अशोक शुक्ला
प्रसिद्धि का कारण: बालिका वधू; बिग बॉस 13; दिल से दिल तक; फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी 7
सिद्धार्थ बेशक आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अपने परिवार, दोस्तों और फैंस के दिलों में वह हमेशा जिंदा रहेंगे. सलमान खान के शो ‘बिग बॉस 13’ का हिस्सा के बाद सिद्धार्थ की इस पॉपुलैरिटी में चार चांद लग गए थे. इसी शो के कुछ समय बाद ही एक्टर का असमय निधन हो गया, जिसने पूरी इंडस्ट्री को झरझोर कर रख दिया था.

ऋषि कपूर

ऋषि कपूर
🎂04 सितम्बर 1952
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
मौत
⚰️30 अप्रैल 2020 (उम्र:67)
पेशा
अभिनेता, निर्माता, निर्देशक
कार्यकाल
1970–2020
जीवनसाथी
नीतू सिंह (विवाहित 1980)
बच्चे
रिधिमा कपूर
रणबीर कपूर
उन्होंने 1973 और 2000 के बीच 92 फिल्मों में रोमांटिक लीड के रूप में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं।दो दूनी चार में उनके प्रदर्शन के लिए, उन्हें 2011 का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स पुरस्कार दिया गया, और कपूर एण्ड सन्स में अपनी भूमिका के लिए, उन्होंने 2017 का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उन्हें 2008 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।वह 1973 से 1981 के बीच बारह फिल्मों में अपनी पत्नी नीतू सिंह (1980 में शादी) के साथ दिखाई दिए। 30अप्रैल 2020 को अस्थिमेरु कैंसर (बोन मैरो कैंसर) के कारण आयी परेशानी से उनकी 67वर्ष की आयु में मृत्यु हो गयी।
कपूर का जन्म पंजाब के कपूर परिवार में मुंबई के चेम्बूर में हुआ था। वह विख्यात अभिनेता-फिल्म निर्देशक राज कपूर के पुत्र और अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के पोते थे। उन्होंने कैंपियन स्कूल, मुंबई और मेयो कॉलेज, अजमेर में अपने भाइयों के साथ अपनी स्कूली शिक्षा की। उनके भाई रणधीर कपूर और राजीव कपूर, मामा प्रेमनाथ और राजेन्द्रनाथ और चाचा शशि कपूर और शम्मी कपूर सभी अभिनेता हैं।
ऋषि कपूर स्‍वर्गीय राज कपूर के बेटे और पृथ्‍वीराज कपूर के पोते है। परम्‍परा के अनुसार उन्‍होने भी अपने दादा और पिता के नक्‍शे क़दम पर चलते हुए फिल्‍मों में अभिनय किया और वे एक सफल अभिनेता के रूप में उभर कर आए। मेरा नाम जोकर उनकी पहली फिल्‍म थी जिसमें उन्‍होने अपने पिता के बचपन का रोल किया था। बतौर मुख्य अभिनेता के रूप में उनकी पहली फ़िल्म बॉबी थी, जिसमें उनके साथ डिंपल कपाड़िया भी दिखाई दी। ऋषि कपूर और नीतू सिंह की शादी 22 जनवरी 1980 में हुई थी।

ऋषि कपूर के दो संतानें है: रणबीर कपूर जो हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता है और रिद्धिमा कपूर जो एक ड्रैस डिजाइनर हैं। करिश्मा कपूर और करीना कपूर इनकी भतीजियां हैं। आलिया भट्ट इनकी पुत्रवधु है जो निर्माता एवम निर्देशक महेश भट्ट की पुत्री है। कपूर अपने सोशल मीडिया पर उनकी टिप्पणियों के लिए विवादों में रहे हैं।

वर्ष 2018में उन्हें कैंसर का पता चला था, जिसके बाद लगभग एक वर्ष तक न्यूयॉर्क में उनका इलाज चला था। तत्पश्चात, भारत वापसी के बाद वे सार्वजनिक तौरपर बहुत कम देखे जाने लगे थे, जिस बीच उनका इलाज चलता रहा। अपने अंतिम समय में वे मुम्बई के एच॰एन॰ रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में भर्ती थे। इसबीच वे अपनी फिल्म शर्माजी नमकीन की शूटिंग कर रहे थे।30 अप्रैल 2020 (उम्र:67) में उनका निधन हो गया

निधन

शक्ति कपूर

प्रसिद्ध खल अभिनेता कॉमेडियन शक्ति कपूर के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
सुनील सिकन्दरलाल कपूर उर्फ़ शक्ति कपूर एक भारतीय अभिनेता हैं। वह हिंदी सिनेमा में अपनी खलनायकी और कॉमिक टाइमिंग के लिए के लिए जाने जाते हैं। शक्ति कपूर का जन्म एक बेहद निम्‍न मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार में 3 सितंबर 1958 को नई दिल्ली में हुआ था। उनके पिता दिल्ली के कनॉट प्लेस में एक दर्जी की दुकान चलाते थे। उनके नाम बदलने के पीछे भी एक वजह है, दरअसल जब सुनील दत्त साहब ने संजय दत्त स्टारर फिल्म रॉकी में विलेन का रोल ऑफर किया तो उन्हें अपना नाम सुनील कपूर विलेन की तरह नही लगा, इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर शक्ति कपूर कर लिया।
पढ़ाई
उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में ही सम्पन्न की हैं। वह दिल्ली यूनवर्सिटी के करोड़ी मॉल कॉलेज से ग्रेजुएट हैं।
शादी
शक्ति कपूर की शादी शिवांगी कपूर से हुई हैं। उनकी दो बच्चे हैं, एक बेटा-सिद्धार्थ कपूर जोकि एक सहायक निर्देशक और डीजे हैं। उनकी बेटे श्रद्धा कपूर हैं, जोकि हिंदी सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री हैं।
कैरियर
शक्ति कपूर फिल्म इंडस्ट्री में आज जिस मुकाम पर हैं, व्हाँ उन्होंने पहुँचने के लिए इस इंडस्ट्री में कड़ी मेहनत की हैं। साल 1980 के दौर में शक्ति कपूर को बतौर अभिनेता पहचाना जाने लगा। उस साल उनकी दो फ़िल्में क़ुरबानी और रॉकी ब्लॉकबस्टर हिट फ़िल्में साबित हुई थी। इन दोनों ही फिल्मों में उन्होंने मुख्य खलनायक की भूमिका अदा की थी।
साल 1983 में शक्ति जितेंद्र और श्रीदेवी स्टारर फिल्म हिम्मतवाला और सुभाष घई निर्देशित फिल्म हीरो में खलनायक के किरदार में नजर आएं। अपनी चार फिल्मों खलनायकी का बेहतरीन अभिनय करने के बाद शक्ति कपूर बॉलीवुड के बेहतरीन खलनायकों की श्रेणी में आ गए थे। अस्सी और नब्बे के दशक में खलनायकी के किरदार के निर्देशकों और निर्मातायोँ की पहली पसंद अमरीश पूरी या फिर शक्ति कपूर ही होते थे।
नब्बे के दशक में कपूर ने खलनायकी को थोड़ा दरकिनार करते हुए कॉमिक रोल करने शुरू आकर दिए। जिस तरह वो पूरे परफेक्शन के साथ खलनायकी की भूमिका निभाते हैं उसी तरह उन्होंने कॉमिक रोल निभाए। उन्हें उनकी बेहतरीन कोमी टाइमिंग के लिए फिल्म राजा बाबू के नंदू की भूमिका अदा करने के लिए उन्हें फिल्मफेयर के कॉमिक रोल के अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी कॉमिक फ़िल्में- इंसाफ, बाप नंबरी बीटा दस नंबरी, अंदाज अपना अपना, तोहफा, राजाबाबू, हम साथ साथ हैं, चालबाज, बोल राधा बोल।
वह सिर्फ एक अच्छे खलनायक ही नहीं बल्कि काफी अच्छे मिमिक्री आर्टिस्ट भी हैं। हिंदी सिनेमा में आज भी उनके प्रसिद्ध डाइलोग दर्शकों की जुबान पर चढ़े हुए हैं। जिनमे राजा बाबू का- नंदू सबका बंदु समझता नहीं है यार, फिल्म चालबाज का मैं नन्हा सा मुन्ना सा छोटा सा बच्चा हूँ।
टीवी_करियर
वह कलर्स टीवी के प्रसिद्ध रियल्टी शो बिगबॉस में भी बतौर प्रतिभागी नजर आ चुके हैं। वह म्यूजिकल कॉमेडी शो आसमान से गिरे खजूर पर अटके में भी नजर आ चुके हैं।

हबीब तनवीर

महान पटकथा लेखक, नाट्य निर्देशक, कवि और अभिनेता हबीब तनवीर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🌹🌷🥀🪴💐🌸🏵️🌻🌼🍀🌺🌹🌷🥀🪴
हबीब तनवीर भारत के सबसे मशहूर पटकथा लेखक, नाट्य निर्देशक, कवि और अभिनेता थे। हबीब तनवीर हिन्दुस्तानी रंगमंच के शलाका पुरुष थे। उन्होंने लोकधर्मी रंगकर्म को पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित किया और भारतीय रंगमंच को एक नया मुहावरा दिया।
जीवन_परिचय
हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर, 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था। उनके पिता हफ़ीज अहमद खान पेशावर (पाकिस्तान) के रहने वाले थे। स्कूली शिक्षा रायपुर और बी.ए. नागपुर के मौरिस कॉलेज से करने के बाद वे एम.ए. करने अलीगढ़ गए। युवा अवस्था में ही उन्होंने कविताएँ लिखना आरंभ कर दिया था और उसी दौरान उपनाम ‘तनवीर’ उनके साथ जुडा। 1945 में वे मुंबई गए और ऑल इंडिया रेडियो से बतौर निर्माता जुड़ गए। उसी दौरान उन्होंने कुछ फ़िल्मों में गीत लिखने के साथ अभिनय भी किया।
इप्टासेसंबंध
मुंबई में तनवीर प्रगतिशील लेखक संघ और बाद में इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़े। ब्रिटिशकाल में जब इप्टा से जुड़े तब अधिकांश वरिष्ठ रंगकर्मी जेल में थे। उनसे इस संस्थान को संभालने के लिए भी कहा गया था। 1954 में उन्होंने दिल्ली का रुख़ किया और वहाँ कुदेसिया जैदी के हिंदुस्तान थिएटर के साथ काम किया। इसी दौरान उन्होंने बच्चों के लिए भी कुछ नाटक किए
विवाह
दिल्ली में तनवीर की मुलाकात अभिनेत्री मोनिका मिश्रा से हुई जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। यहीं उन्होंने अपना पहला महत्त्वपूर्ण नाटक ‘आगरा बाज़ार’ किया। 1955 में तनवीर इग्लैंड गए और रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक्स आर्ट्स (राडा) में प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब उन्होंने यूरोप का दौरा करने के साथ वहाँ के थिएटर को क़रीब से देखा और समझा
कार्यक्षेत्र
50 वर्षों की लंबी रंग यात्रा में हबीब जी ने 100 से अधिक नाटकों का मंचन व सर्जन किया। उनका कला जीवन बहुआयामी था। वे जितने अच्छे अभिनेता, निर्देशक व नाट्य लेखक थे उतने ही श्रेष्ठ गीतकार, कवि, गायक व संगीतकार भी थे। फ़िल्मों व नाटकों की बहुत अच्छी समीक्षायें भी की। उनकी नाट्य प्रस्तुतियों में लोकगीतों, लोक धुनों, लोक संगीत व नृत्य का सुन्दर प्रयोग सर्वत्र मिलता है। उन्होंने कई वर्षों तक देश भर ग्रामीण अंचलों में घूम-घूमकर लोक संस्कृति व लोक नाट्य शैलियों का गहन अध्ययन किया और लोक गीतों का संकलन भी किया।
नयाथियेटरकी_स्थापना
छठवें दशक की शुरुआत में नई दिल्ली में हबीब तनवीर की नाट्य संस्था ‘नया थियेटर’ और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना लगभग एक समय ही हुई। यह उल्लेखनीय है कि देश के सर्वश्रेष्ठ नाट्य संस्था राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पास आज जितने अच्छे लोकप्रिय व मधुर गीतों का संकलन है उससे कहीं ज्यादा संकलन ‘नया थियेटर’ के पास मौजूद हैं। एच.एम.वी. जैसी बड़ी संगीत कंपनियों ने हबीब तनवीर के नाटकों के गीतों के कई आडियो कैसेट भी तैयार किये जो बहुत लोकप्रिय हुए।
हिन्दीरंगमंचका_विकास
आजादी से पहले हिन्दी रंगकर्म पर पारसी थियेटर की पारम्परिक शैली का गहरा प्रभाव था। साथ ही हिन्दुस्तान के नगरों और महानगरों में पाश्चात्य रंग विधान के अनुसार नाटक खेले जाते थे। आजादी के बाद भी अंग्रेज़ी और दूसरे यूरोपीय भाषाओं के अनुदित नाटक और पाश्चात्य शैली हिन्दी रंगकर्म को जकड़े हुए थी। उच्च और मध्य वर्ग के अभिजात्यपन ने पाश्चात्य प्रभावित रुढिय़ों से हिन्दी रंगमंच के स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध कर रखा था और हिन्दी का समकालीन रंगमंच नाट्य प्रेमियों की इच्छाओं को संतुष्ट करने में अक्षम था। हबीब तनवीर ने इन्हीं रंग परिदृश्य को परिवर्तित करने एक नए और क्रांतिकारी रंग आंदोलन का विकास किया।
प्रमुख_कृतियाँ
नाटक
आगरा बाज़ार (1954)
शतरंज के मोहरे (1954)
लाला शोहरत राय (1954)
मिट्टी की गाड़ी (1958)
गाँव का नाम ससुराल मोर नाम दामाद (1973)
चरणदास चोर (1975)
पोंगा पण्डित
द ब्रोकन ब्रिज (1995)
ज़हरीली हवा (2002)
राज रक्त (2006)
फ़िल्म
फ़ुट पाथ
सम्मानऔरपुरस्कार
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1969)
पद्मश्री (1983)
संगीत नाटक एकादमी फेलोशिप (1996)
पद्म भूषण (2002)
कालिदास सम्मान (1990)
1972 से 1978 तक भारतीय संसद के उच्च सदन में राज्यसभा सदस्य।
इनका नाटक ‘चरणदास चोर’ एडिनवर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टीवल (1982) में पुरस्कृत होने वाला ये पहला भारतीय नाटक था।
निधन
हबीब तनवीर का निधन 8 जून, 2009 को भोपाल, मध्य प्रदेश में हो गया। थिएटर के विश्वकोष कहे जाने वाले तनवीर का निधन ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई असंभव है।

दुष्यंत

प्रसिद्ध कवि, ग़ज़लकार साहित्यकार दुष्यंत कुमार के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
💐🌹🥀🌺🪴🏵️🌸🌻🌼🌺🪴🥀🌷💐🌹
दुष्यंत कुमार एक हिंदी कवि और ग़ज़लकार थे। समकालीन हिन्दी कविता विशेषकर हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली, वो दशकों बाद विरले किसी कवि को नसीब होती है। दुष्यंत एक कालजयी कवि हैं और ऐसे कवि समय काल में परिवर्तन हो जाने के बाद भी प्रासंगिक रहते हैं। दुष्यंत का लेखन का स्वर सड़क से संसद तक गूँजता है। इस कवि ने कविता, गीत, ग़ज़ल, काव्य, नाटक, कथा आदि सभी विधाओं में लेखन किया लेकिन गज़लों की अपार लोकप्रियता ने अन्य विधाओं को नेपथ्य में डाल दिया।
जीवन_परिचय
दुष्यंत कुमार का जन्म बिजनौर जनपद (उत्तर प्रदेश) के ग्राम राजपुर नवादा में 1 सितम्बर, 1933 को हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत कुछ दिन आकाशवाणी, भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर रहे। इलाहाबाद में कमलेश्वर, मार्कण्डेय और दुष्यंत की दोस्ती बहुत लोकप्रिय थी। वास्तविक जीवन में दुष्यंत बहुत, सहज और मनमौजी व्यक्ति थे। कथाकार कमलेश्वर बाद में दुष्यंत के समधी भी हुए। दुष्यंत का पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था। प्रारम्भ में दुष्यंत कुमार परदेशी के नाम से लेखन करते थे।
कृतियाँ
इन्होंने ‘एक कंठ विषपायी’, ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाज़ों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का बसंत’, ‘छोटे-छोटे सवाल’ और दूसरी गद्य तथा कविता की किताबों का सृजन किया। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 42 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।
अमिताभबच्चनके_प्रशंसक
दुष्यंत कुमार ने बॉलीवुड महानायक अमिताभ बच्चन को उनकी फिल्म ‘दीवार’ के बाद पत्र लिखकर उनके अभिनय की तारीफ की और कहा कि- “वह उनके ‘फैन’ हो गए हैं।” दुष्यंत कुमार का वर्ष 1975 में निधन हो गया था और उसी साल उन्होंने यह पत्र अमिताभ को लिखा था। यह दुर्लभ पत्र हाल ही में उनकी पत्नी राजेश्वरी त्यागी ने उन्हीं के नाम से स्थापित संग्रहालय को हाल ही में सौंपा है। दुष्यंत कुमार और अमिताभ के पिता डॉ. हरिवंशराय बच्चन में गहरा प्रेम था। ‘दीवार’ फिल्म में उन्होंने अमिताभ की तुलना तब के सुपर स्टार्स शशि कपूर और शत्रुघ्न सिन्हा से भी की थी। हिन्दी के इस महान् साहित्यकार की धरोहरें ‘दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय’ में सहेजी जा रही हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि साहित्य का एक युग यहां पर जीवित है।
दुष्यंत कुमार ने अमिताभ को लिखे इस पत्र में कहा, ‘किसी फिल्म आर्टिस्ट को पहली बार खत लिख रहा हूं। वह भी ‘दीवार’ जैसी फिल्म देखकर, जो मानवीय करुणा और मनुष्य की सहज भावुकता का अंधाधुंध शोषण करती है।’ कवि और शायर ने अमिताभ को याद दिलाया, ‘तुम्हें याद नहीं होगा। इस नाम (दुष्यंत कुमार) का एक नौजवान इलाहाबाद में अक्सर बच्चन साहब के पास आया करता था, तब तुम बहुत छोटे थे। उसके बाद दिल्ली के विलिंगटन क्रेसेंट वाले मकान में आना-जाना लगा रहा। लेकिन तुम लोगों से संपर्क नहीं रहा। दरअसल, कभी ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई। मैं तो बच्चनजी की रचनाओं को ही उनकी संतान माने हुए था।’ दुष्यंत कुमार ने लिखा, ‘मुझे क्या पता था कि उनकी एक संतान का कद इतना बड़ा हो जाएगा कि मैं उसे खत लिखूंगा और उसका प्रशंसक हो जाउंगा।
वर्तमानकवियोंकीनज़रमेंदुष्यंतकुमार
निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं-
“दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है।”
दिनेश ग्रोवर, प्रकाशक लोकभारती इलाहबाद
सूर्य का स्वागत
दुष्यन्त अपने जीवनकाल में ही एक किंवदंती बन गए थे। उनकी लोकप्रियता का अनुमान केवल इतनी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनावों में आमने -सामने दो विरोधी पार्टियां एक ही तख्ती लगाये चल रही थी; सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं / मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए हम फख्र से कह सकते हैं कि हिंदी ने मीर, ग़ालिब भले न पैदा किये हों मगर दुष्यन्त कुमार को पैदा किया है और यही हमारी हिंदी की जातीय अस्मिता की एक बहुत बड़ी विजय है।
लोकप्रिय कवि यश मालवीय
दुष्यन्त की कविता ज़िन्दगी का बयान है। ज़िन्दगी के सुख- दुःख में उनकी कविता अनायास याद आ जाती है। विडम्बनायें उनकी कविता में इस तरह व्यक्त होती हैं कि आम आदमी को वे अपनी आवाज़ लगने लगती हैं। समय को समझने और उससे लड़ने की ताकत देती ये कवितायें हमारे समाज में हर संघर्ष में सर्वाधिक उद्धरणीय कविताएँ हैं। सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं / मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए यह मात्र एक शेर नहीं ज़िन्दगी का एक दर्शन है फलसफा है। चूँकि दुष्यन्त की कविताएँ जनता के जुबान पर चढ़ी हुई हैं इसलिए मीडिया के लोग भी विशेष मौकों पर अपनी बात जन तक पहुँचाने के लिए, उनके दिलों में उतार देने के लिए दुष्यन्त की शायरी का इस्तेमाल करते हैं। दुष्यन्त की ग़ज़लें कठिन समय को समझने के लिए शास्त्र और उनसे जूझने के लिए शस्त्र की तरह हैं।
प्रकाशित_रचनाएं
काव्यसंग्रह
सूर्य का स्वागत
आवाज़ों के घेरे
जलते हुए वन का वसन्त
उपन्यास
छोटे-छोटे सवाल
आँगन में एक वृक्ष
दुहरी ज़िंदगी।
एकांकी
मन के कोण
नाटक
और मसीहा मर गया
गज़ल_संग्रह
साये में धूप
काव्य नाटक
एक कण्ठ विषपायी
इनके अतिरिक्त कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें तथा कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद भी किया।
निधन
दुष्यंत कुमार का निधन 30 दिसम्बर सन 1975 में सिर्फ़ 42 वर्ष की अवस्था में हो गया। दुष्यंत ने केवल देश के आम आदमी से ही हाथ नहीं मिलाया उस आदमी की भाषा को भी अपनाया और उसी के द्वारा अपने दौर का दुख-दर्द गाया।
दुष्यंत कुमार की कुछ पंक्तियाँ
1.
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। -दुष्यंत कुमार
2.
मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ ,
वो गज़ल आपको सुनाता हूँ।
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ।
तू किसी रेल सी गुजरती है,
मैं किसी पुल -सा थरथराता हूँ।
हर तरफ़ एतराज़ होता है,
मैं अगर रोशनी में आता हूँ।
एक बाजू उखड़ गया जब से,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ।
मैं तुझे भूलने की कोशिश में,
आज कितने क़रीब पाता हूँ।
कौन ये फासला निभाएगा,
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ। -दुष्यंत कुमार

राज कमल

प्रसिद्ध संगीतकाऱ राजकमल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
राज कमल (15 जनवरी 1921 – 1 सितंबर 2005) एक प्रसिद्ध भारतीय संगीतकार थे। उन्होंने क्लासिकल संगीत की रचना की जैसे कि अविस्मरणीय चश्म-ए-बद्दूर,कहाँ से आये बदरा, काली घोडी द्वार खड़ी, सावन कोई आने चाँद जैसे मुखडे पे केजे येशुदास, तकदीर से कोई आनंद सी आनंद द्वारा गाया गया गीत, और कई अन्य मशहूर गाने। उन्होंने बी आर चोपड़ा के क्लासिक टेलीविजन शो महाभारत के लिये संगीत की रचना की

संगीतकार राज कमल का जन्म राजस्थान के मथानिया नामक गाँव में हुआ था जन्म के बाद उनका नाम दलपत रखा गया, जिसे उन्होंने बाद में बॉलीवुड के लिए राज कमल में बदल दिया। वह 5 बच्चों में सबसे बड़े थे। राज कमल अपने पूरे परिवार के साथ बंबई आए; उनके पिता को उनके भाई, तबला वादक पं0 बंसीलाल भारती के यहाँ रखवा दिया शादी के बाद राज कमल और उनकी पत्नी सागर के 6 बच्चे हुए – चंद्र कमल, सूर्य कमल, विनय कमल, हृदय कमल, शुभ कमल और एक बेटी। उनके तीन बड़े बेटे सभी संगीतकाऱ हैं। राज कमल के एक और चाचा, गायक आनंदकुमार सी। भी बॉलीवुड में शामिल हुए और उन्होंने राज कमल की कई रचनाएँ गाईं।

राज कमल की मृत्यु अल्जाइमर रोग से 1 सितंबर 2005 को 84 वर्ष की आयु में हुई,

सुमित्रा देवी

गुज़रे जमाने की मशहूर अभिनेत्री सुमित्रा देवी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सुमित्रा देवी
🎂22 जुलाई 1923 –
⚰️28 अगस्त 1990

एक भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्हें 1940 और 1950 के दशक के दौरान हिंदी के साथ-साथ बंगाली सिनेमा में उनके काम के लिए पहचाना जाता है।उन्हें दादा गुंजाल द्वारा निर्देशित 1952 की हिंदी फिल्म ममता में उनकी भूमिका के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। वह दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए बीएफजेए पुरस्कार की प्राप्तकर्ता थीं। वह अपने समय की उत्कृष्ट सुंदरियों में से एक थीं और उन्हें प्रदीप कुमार और उत्तम कुमार जैसे दिग्गजों ने अपने समय की सबसे खूबसूरत महिला माना है।
सुमित्रा देवी का जन्म 22 जुलाई 1923 में शिउरी, बीरभूम, पश्चिम बंगाल में हुआ था। उनका मूल नाम नीलिमा चट्टोपाध्याय था। उनके पिता मुरली चट्टोपाध्याय एक वकील थे।उनके भाई का नाम रणजीत चट्टोपाध्याय था। उनका पालन-पोषण बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ था। एक बड़े भूकंप के कारण मुजफ्फरपुर में उनका घर और संपत्ति बर्बाद हो गया इसीलिए उनका परिवार कलकत्ता में स्थानांतरित हो गया।
अपनी किशोरावस्था में, वह अनुभवी अभिनेत्री कानन देवी की सुंदरता और कद से काफी प्रभावित थीं और एक अभिनेत्री बनने की ख्वाहिश रखती थीं 1943 में उन्हें न्यू थिएटर के कार्यालय में एक साक्षात्कार और लुक टेस्ट के लिए बुलाया गया था और अंत में हेमचंदर की फ़िल्म मेरी बहन (1944) में केएल सहगल के सामने कास्ट किया गया था। इस फिल्म के निर्माण के दौरान उन्हें अपूर्वा मित्रा की बंगाली फिल्म संधि (1944) में मुख्य भूमिका निभाने की पेशकश की गई, जो उनकी पहली फिल्म थी। फिल्म ने जबरदस्त सफलता हासिल की और उन्हें 1945 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का बीएफजेए पुरस्कार मिला। 1940 के दशक के अंत में उन्होंने वसीयतनामा (1945), भाई दूज (1947), ऊँच नीच (1948) और विजय यात्रा (1948) जैसी फिल्मों में भूमिकाओं के साथ खुद को बॉलीवुड की एक प्रमुख अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर दिया दादा गुंजाल की फ़िल्म ममता (1952) में एक एकल माँ के रूप में उनकी भूमिका के लिए उन्हें सराहा गया। फ़िल्म दीवाना ,घुंघरू (1952), मयूरपंख (1954), चोर बाजार (1954) और जागते रहो (1956) जैसी फिल्मों में उनकी भूमिका को दर्शकों द्वारा सराहा गया
उन्होंने बंगाली फ़िल्म अभिजोग (1947), पाथेर डाबी (1947), प्रतिबाद (1948), जोयजात्रा (1948), स्वामी (1949), देवी चौधुरानी (1949), समर (1950), दस्यु मोहन (1955)जैसी फिल्मों के साथ बंगाली सिनेमा में अपना करियर बनाए रखा। कार्तिक चट्टोपाध्याय की पंथ क्लासिक साहेब बीबी गुलाम (1956) में एक जमींदार की खूबसूरत शराबी पत्नी के रूप में उनकी भूमिका ने कई कीर्तिमान स्थापित कर दिए जो इसी नाम के बिमल मित्रा के क्लासिक उपन्यास का रूपांतरण था हरिदास भट्टाचार्य की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बंगाली फिल्म अंधारे अलो (1957) में शोक संतप्त दिल वाली एक शरारती लड़की बिजली के उनके चित्रण को जबरदस्त आलोचनात्मक प्रतिक्रिया मिली। उन्होंने एकदीन रात्रे (1956), नीलाचले महाप्रभु (1957), जौटुक (1958) और किनू गोवालर गली (1964) जैसी बंगाली फिल्मों में अपनी भूमिकाओं के लिए भी प्रशंसा प्राप्त की। पचास के दशक के अंत में, उन्हें भारत से एक प्रतिनिधि के रूप में चीन में एशियाई फिल्म समारोह में आमंत्रित किया गया था।
अपनी किशोरावस्था के दौरान, वह चंद्रबाती देवी और कानन देवी जैसी अनुभवी अभिनेत्रियों की सुंदरता और कद से काफी प्रभावित थीं और एक अभिनेत्री बनने की ख्वाहिश रखती थीं। उसने अपनी एक तस्वीर के साथ एक आवेदन पत्र न्यू थिएटर के कार्यालय को भेजने का फैसला किया। चूंकि उनके पिता रूढ़िवादी थे, उन्होंने इसे गुप्त रूप से करने का फैसला किया और अपनी योजना को फलदायी बनाने के लिए, उन्होंने अपने छोटे भाई रणजीत की मदद मांगी, जो उनके साथ सहयोग करने के लिए सहमत हो गए। उनके पत्र का उत्तर दिया गया और उसे साक्षात्कार और लुक टेस्ट के लिए बुलाया गया। न्यू थिएटर के कार्यालय में, उसे एक लेख को अच्छी तरह से पढ़ने के लिए कहा गया और उसने अपनी सुंदरता के साथ-साथ अपनी आकर्षक, सुरीली आवाज से वहां मौजूद सभी लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्हें न्यू थिएटर्स की मेरी बहन (1944) में के. एल. सहगल के साथ मुख्य भूमिका के लिए चुना गया था।नीलिमा ने अपना स्क्रीन नाम सुमित्रा देवी अपनाया।हालांकि मेरी बहन सुमित्रा देवी की पहली फिल्म मानी जा रही थी, लेकिन आखिरकार उन्होंने अपूर्वा मित्रा की बंगाली फिल्म संधि (1944) से अपनी शुरुआत की, जो बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी हिट रही। संधि (1944) में उन्होंने अपनी भूमिका कैसे प्राप्त की, इसके बारे में अलग-अलग अटकलें हैं। आनंदलोक ने लिखा है कि अपूर्वा मित्रा ने उन्हें मेरी बहन की शूटिंग फ्लोर देखा था और उन्होंने उन्हें अपने निर्देशन वाली फ़िल्म में अभिनय करने की पेशकश की थी। सिनेप्लॉट ने दावा किया कि वास्तव में सुमित्रा देवी ने ही देबाकी बोस को उनकी फिल्म में अभिनय करने का प्रस्ताव दिया था और यह बोस ही थे जिन्होंने अंततः उन्हें अपने भतीजे अपूर्वा मित्रा के निर्देशन में बनने वाली फिल्म में कास्ट किया। सूत्र के अनुसार, बोस यह जानना चाहते थे कि क्या फिल्म जगत में कदम रखने के लिए उनके पिता की सहमति थी। उन्होंने कबूल किया कि उनके पिता फ़िल्म में काम करने से सहमत नहीं थे और उसके पिता इस बात के लिए अपनी सहमति देने के लिए बहुत रूढ़िवादी थे। चूंकि बोस उन्हें कास्ट करने के लिए उत्सुक थे, उन्होंने बी एन सरकार से उनके पिता मुरली चट्टोपाध्याय को अपनी सहमति देने के लिए मनाने का अनुरोध किया। जैसा कि बी.एन. सरकार सर एम.एन. सरकार के बेटे थे, जो एक प्रख्यात वकील थे और मुरली चट्टोपाध्याय के करीबी दोस्त थे, वे अंततः सरकार की विनती के आगे झुक गए और अनिच्छा से अपनी सहमति दे दी। फिल्म के रिलीज होने के बाद, उनके कुशल अभिनय कौशल के लिए उनकी सराहना की गयी सुमित्रा ने 1945 में बंगाल फिल्म पत्रकार संघ – सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता मेरी बहन (1944) ने रिलीज होने पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की। यह उस साल की चौथी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई। इसके बाद वह सौम्यन मुखोपाध्याय की हिंदी फिल्म वसीयतनामा (1945) में दिखाई दीं, जो मूल रूप से अनुभवी बंगाली लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास कृष्णकांतर विल का रूपांतरण थी। इस फिल्म में, उन्होंने एक खूबसूरत विधवा का किरदार निभाया, जो पुरुष नायक को बहकाती है, उसके साथ भाग जाती है और अंततः उसके द्वारा मार दी जाती है। उन्होंने फिल्म में अपने मोहक और दिलकश प्रदर्शन के लिए अच्छी प्रशंसा अर्जित की।फिल्मस्तान ने लिखा, “उनमें वह उदासी थी जिसे उन्होंने रोहिणी के चरित्र को जीवंत करने के लिए अपनी सुंदरता के साथ जोड़ दिया था।” उनकी अगली बड़ी फ़िल्म सतीश दासगुप्ता और दिगंबर चट्टोपाध्याय के निर्देशन में बनी फिल्म पाथेर डाबी (1947) थी, जो प्रसिद्ध बंगाली लेखक शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के इसी नाम के उपन्यास का रूपांतरण थी मुख्य भूमिका में देबी मुखर्जी ने भी अभिनय किया। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट साबित हुई क्योंकि इसकी सामग्री समकालीन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न पहलुओं से संबंधित थी। फिल्म में उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें आलोचकों से सकारात्मक समीक्षा मिली। सुशील मजूमदार की अभिजोग (1947) में उन्हें देबी मुखर्जी के साथ फिर से कास्ट किया गया, जो बॉक्स ऑफिस पर एक और बड़ी सफलता बन गई। उनकी अगली फ़िल्म हेमचंद्र चंद्र की हिंदी और बंगाली में बनी फिल्म ऊँच नीच (1948) थी, जिसका बंगाली संस्करण प्रतिबाद शीर्षक के तहत जारी किया गया था। फिल्म ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों मोर्चों पर एक बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल की। वह निरेन लाहिड़ी की हिंदी बंगाली में बनी फिल्म विजय यात्रा (1948) में दिखाई दीं, जिसका बंगाली संस्करण जॉयजात्रा शीर्षक के तहत जारी किया गया था। उनकी अगली बड़ी फ़िल्म सतीश दासगुप्ता की देवी चौधुरानी (1949) थी जो प्रसिद्ध बंगाली लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के इसी नाम के क्लासिक उपन्यास का रूपांतरण थी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी सफल फ़िल्म साबित हुई
1950 में, वह नितिन बोस की हिंदी फिल्म मशाल में दिखाई दीं, जो कि अनुभवी लेखक बंकिम चंद्र छोट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास रजनी पर आधारित है। उन्होंने तरंगिनी का किरदार निभाया जो अशोक कुमार द्वारा निभाए गए समर के चरित्र से प्यार करती है, लेकिन उसके पिता ने एक अमीर जमींदार से शादी करने के लिए मजबूर किया। फिल्म ने व्यावसायिक सफलता हासिल की। वर्ष 1952 में उनकी चार बॉलीवुड फिल्मे दीवाना, घुंघरू, ममता, राजा हरिश्चंद्र रिलीज हुई दीवाना और घुंघरू को बॉक्स ऑफिस पर उल्लेखनीय सफलता मिली। उनकी अन्य रिलीज़ फिल्मे मयूरपंख (1954), चोर बाज़ार (1954), जगते रहो (1956) और दिल्ली दरबार (1956) थीं।
1955 में, वह अर्धेंदु मुखोपाध्याय की बंगाली फिल्म दस्यु मोहन में दिखाई दीं, जो बॉक्स ऑफिस पर बहुत हिट हुई। 1956 में, वह पिनाकी मुखोपाध्याय की बंगाली फिल्म असाबरना (1956) और कार्तिक चट्टोपाध्याय की ब्लॉकबस्टर साहेब बीबी गुलाम (1956) में दिखाई दीं, जो बिमल मित्रा के इसी नाम के क्लासिक उपन्यास का रूपांतरण थी इस फिल्म में उनके रोल के लिए उन्हें सबसे ज्यादा याद किया जाता है। निर्देशक कार्तिक चट्टोपाध्याय उन्हें छोटे जमींदार की सुंदर, भोली मालकिन की भूमिका में लेने के लिए उत्सुक थे, लेकिन साथ ही साथ उन्हें लगा कि वह इस भूमिका से इंकार कर सकती हैं क्योंकि यह कुछ हद तक उनके वैवाहिक जीवन को दर्शाती थी . लेकिन सुमित्रा देवी ने फ़िल्म में अभिनय करना स्वीकार कर लिया
यह फिल्म 9 मार्च 1956 को रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट साबित हुई। 1957 में, वह कार्तिक चट्टोपाध्याय की एक और ब्लॉकबस्टर नीलाचले महाप्रभु में दिखाई दीं। हरिदास भट्टाचार्य की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म अंधारे आलो (1957) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें और अधिक सराहा गया।
1958 में, उन्हें जीवन गंगोपाध्याय के महत्वाकांक्षी फ़िल्म जौटुक में उत्तम कुमार के साथ अभिनय किया था। साठ के दशक में सुमित्रा देवी का आकर्षण धीमा पड़ने लगा। 1964 में, उन्होंने चंद्रकांत गोर की हिंदी फिल्म वीर भीमसेन में द्रौपदी के चरित्र को निभाया उसी वर्ष, वह ओ.सी. गंगोपाध्याय की किनू गोवालर गली में दिखाई दीं, जहां उन्होंने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया, जो अपने पति के प्यार को वापस पाने के लिए बेताब है।
सुमित्रा देवी ने 21 अक्टूबर 1946 को अभिनेता देवी मुखर्जी से शादी की। 1 दिसंबर 1947 को, उन्होंने अपने बेटे बुलबुल को जन्म दिया और 11 दिसंबर 1947 को उनके पति मुखर्जी का निधन हो गया।
28 अगस्त 1990 में 67 साल की उम्र में सुमित्रा देवी का निधन हो गया

Bn sharma

बद्री नाथ शर्म
*●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●

पंजाबी कलाकार BN Sharma
🎂जन्म की तारीख और समय: 23 अगस्त 1965
Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2
बी एन शर्मा एक भारतीय अभिनेता हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत जालंधर दूरदर्शन पर एक पंजाबी धारावाहिक जेब कटेरे और कॉमेडी धारावाहिक फ्लॉप शो से की। उन्हें महाल ठीक है, जट्ट एंड जूलियट और कैरी ऑन जट्टा जैसी फिल्मों में उनकी भूमिकाओं के लिए जाना जाता है।
●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●

बीएन शर्मा (बद्री नाथ शर्मा) पंजाबी फिल्म उद्योग में एक अभिनेता हैं। उनका जन्म रोपड़ में हुआ था और उनका पालन-पोषण दिल्ली में मूल रूप से गुजरांवाला के एक परिवार में हुआ था । हालाँकि उनके माता-पिता चाहते थे कि वह इंजीनियरिंग में अपना करियर बनायें, लेकिन वह 1972 में चंडीगढ़ चले गये और थिएटर के प्रति प्रेम विकसित करने के बाद अभिनय में अपना करियर बनाते हुए पंजाब पुलिस विभाग में सेवा की। एक कांस्टेबल के रूप में अपनी सेवा के दौरान उन्होंने 40-45 फिल्में पूरी कीं। उनके 3 बेटे (ट्रिप्लेट) और एक बेटी है।
उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1985 में जालंधर दूरदर्शन के पंजाबी धारावाहिक जेब कतरे ( पॉकेट पिकर्स ) में एक नकारात्मक किरदार से की। उनकी पहली फिल्म वैसाखी (1987) थी, जो हिट रही। उन्होंने 1989 में हिट श्रृंखला फ्लॉप शो में एक आवर्ती और अलग चरित्र के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने उल्टा पुल्टा और फुल टेंशन जैसे अन्य उद्यमों में जसपाल भट्टी के साथ सहयोग किया। भ्रष्टाचार विरोधी कॉमिक फिल्म महौल ठीक है (1999) में उनकी एक छोटी भूमिका थी, जिसके बाद 70 से अधिक पंजाबी फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। उनकी हालिया हिट फिल्मों में जट एंड जूलियट , अर्ध-सीक्वल जट एंड जूलियट 2 और शामिल हैंजट्टा जारी रखो . शर्मा ने पीटीसी पंजाबी फिल्म अवार्ड्स में कॉमिक रोल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीता।
अपने काम में परफेक्शन के लिए उन्हें निर्देशकों द्वारा सराहा गया है।
🌹शर्मा ने पंजाबी मेनिया को बताया, “मैं अभिनय से इतना रोमांचित था कि मैं किसी भी कीमत पर इसका हिस्सा बनना चाहता था।” “मुझे याद है जब मैं बच्चा था (स्कूल जाना शुरू करने से पहले भी), मैं एक गुब्बारे बेचने वाले से बांसुरी खरीदता था और उसे बजाता था। अब मुझे एहसास हुआ कि यह एक कला थी। चूंकि मेरे पिता काफी कठोर थे इसलिए मुझे इसे लेना पड़ा यह बहुत बड़ा कदम है और अब कड़ी मेहनत और सभी के प्यार से मैं अच्छा कर रहा हूं।”
पंजाबी मेनिया के साथ एक साक्षात्कार के दौरान, शर्मा ने यह भी कहा: “मुझे लगता है कि पंजाब सरकार को पंजाबी सिनेमा के लिए भी कुछ उपयोगी काम करना चाहिए, जैसे वे खेलों को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं, जो एक अच्छी बात है। पंजाबी सिनेमा अब अद्भुत काम कर रहा है और हमारा सरकार को इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बनाने के लिए कुछ योगदान देना चाहिए।

फिल्म निर्देशक बासु भट्टा चार्य

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक बासु भट्टाचार्य की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

बसु भट्टाचार्य एक हिंदी फिल्म निर्देशक थे उनकी 1966 में बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म थी जिसमें राज कपूर और वहीदा रहमान ने काम किया था यह फ़िल्म फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा लिखित कहानी मारे गये गुलफाम पर आधारित थी तीसरी कसम को 1967 में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला
सबसे लोकप्रिय और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्म, जिसे उन्होंने निर्देशित किया, राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर अभिनीत अविष्कार थी जिसने बॉलीवुड गाइड कलेक्शंस में फाइव स्टार प्राप्त किए और 1975 में राजेश खन्ना को आविष्कार के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला।
1979 में, उन्होंने स्पर्श का निर्माण किया, जिसने हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता और फिल्म ने फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार भी जीता।
वासु भट्टाचार्य 1976 से 1979 तक भारतीय फिल्म निर्देशक संघ के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया
1981 में वह 12 वें मॉस्को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में जूरी के सदस्य थे
1983 के बाद उनकी कोई भी फ़िल्म सफल नहीं हुई
उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत 1958 में मधुमती और सुजाता जैसी फिल्मों में बिमल रॉय के सहायक के रूप में की थी और बाद में बिमल रॉय की बेटी रिंकी भट्टाचार्य से विवाह किया, यह शादी बिमल रॉय की मंजूरी के बगैर की थी इससे विमल रॉय वासु भट्टाचार्य से नाराज़ हो गये
इससे उनके और उनके गुरु विमल रॉय के बीच दरार पैदा हो गई।
इस दंपति का एक बेटा था, निर्देशक आदित्य भट्टाचार्य और दो बेटियां: चिमु और अन्वेषा आर्य, है
बाद में बहुत अधिक घरेलू दुर्व्यवहार के बाद, उनकी पत्नी रिंकी 1983 में बाहर चली गईं और 1990 में दोनों ने औपचारिक रूप से तलाक ले लिया।
27 अगस्त 1997 में मुम्बई में उनका निधन हो गया
Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें