निर्मल ऋषि जी *●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬● ꧁ निर्मल ऋषि Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2 निर्मल ऋषि जन्म का उप नाम गुलाबो 🎂28 अगस्त 1943 बठिंडा(अबमनसा),पंजाब,ब्रिटिश भारत व्यवसाय अभिनेत्री,शिक्षिका अभी सक्रिय हैं ●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬● ꧁ ऋषि का जन्म 1943 में मनसा जिले के खिवा कलां गांव में ब्राह्मणपरिवार में हुआ था. उनके पिता बलदेव कृष्ण ऋषि और माता का नाम बचनी देवी था। स्कूल के दिनों से ही उन्हें थिएटर का बहुत शौक था। उन्होंने शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षकों का चयन और शारीरिक शिक्षा के लिए सरकारी कॉलेज पटियाल में नामांकन लिया। उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें शामिल हैंलॉन्ग दा लिश्कारा(1983) ऊंचा दर बेब नानक दा (1985), दिवा बाले सारी रात , सुनेहा ,लव पंजाब(2015), डेथ ऑन व्हील्स ,वूमन फ्रॉम द ईस्ट,निक्का जैलदार(2016) शामिल हैं। ),अंग्रेज(2015),लाहौरिये(2017), औरनिक्का जैलदार 2(2017) और बॉलीवुड सुपरहिट फिल्मदंगल(2016) में एक वैज्ञानिक की भूमिका। 📽️ फ़िल्मों की सूची बुहे बैरियान तेरे लै माँ दा लाडला शेर बग्गा सास मेरी ने मुंडा जामिया सौंकण सौंकने नी मैं सस्स कुट्टनी चल मेरा पुट 2 वड्डा कलाकार काके दा वियाह काला शाह काला गुड्डियां पटोले पाणि च मधानि लॉन्ग दा लिश्कारा भागो- शमशेर की बहन शेरन डी पुट शेर कुर्बानी जट्ट दी जिगरा जाट दा दिवा बले सारी रात अँखिला सूरमा खेल तकदीरन दे मेला अखियां उडीकड़ियां लकेरन पंजाबन-प्रेम दिलों पर राज करता है पूर्व की महिला सादी लव स्टोरी दिल्ली छोटे आतंक ओह माय प्यो अंग्रेज डर्रा पंजाब से प्यार है निक्का जैलदार bambukat दंगल लाहौरिये रब्ब दा रेडियो अर्जन असली पंजाब महान सरदार क्रेज़ी तब्बर निक्का जैलदार 2 बैलारस एक अनोखी दुल्हन – सावी हार्ड कौर सूबेदार जोगिंदर सिंह लौंग लाची दाना पानी कैरी ऑन जट्टा 2 कुरमैयां परहुना आटे दी चिड़ी अफसर विवाह महल राजमा चावल भज्जो वीरो वे अर्जुन पटियाला आख़िरी वारिस सोगी के रूप में हर्ष बेनीवाल श्रीमती पम्मी के रूप में लिजा मलिक प्रेम सिंह के रूप में राहुल देव टिड्डा के रूप में निखिल भांबरी श्रीमती छिब्बर के रूप में अन्वेषी जैन समीक्षा सूद कस्तूरी बनर्जी दिविना ठाकुर (निर्मल ऋषि) हू इज योर डैडी ऑल्ट बालाजी रिलीज डेट 2 अप्रैल 2020ऋषि🎂28 अगस्त🎂1943
ग्रेट खली *●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬● ꧁ दलीप सिंह राणा एक भारतीय पेशेवर पहलवान, कुश्ती प्रमोटर और अभिनेता हैं। इनका जन्म 27 अगस्त 1972 को हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के धीरैना गाँव में एक राजपूत परिवार में हुआ था। इनके पिता ज्वाला राम और इनकी माता तांडी देवी हैं। इन्हें WWE में द ग्रेट खली के नाम से जाना जाता है। Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2 जन्म की तारीख और समय: 27 अगस्त 1972 (आयु 50 वर्ष), धिरैना लंबाई: 2.16 मी पत्नी: हरमिंदर कौर (विवा. 2002) वज़न: 157 kg माता-पिता: तांदी देवी, ज्वाला राम ●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬● ꧁ खली का जन्म एक बेहद ही गरीब परिवार में हुआ था। खली सात भाई-बहनों में से एक थे। खली को अपने परिवार की मदद करने के लिए पत्थर तोडने जैसे काम करना पड़ा था। वह एक्रोमेगाली से पीड़ित है। एक्रोमेगाली एक ऐसी बीमारी है जिसके कारण शरीर में वृद्धि हार्मोन की संख्या बहुत अधिक हो जाता है जिससे शरीर में हड्डियों का आकार भी बढ़ जाता है, इससे हाथों, पैरों और चेहरे की हड्डियों में सामान्य से भिन्न विकास होने लगता है। खली सुरक्षा गार्ड की नौकरी भी कर चुके हैं। जब खली हिमाचल प्रदेश के शिमला में एक सुरक्षा गार्ड के रूप में नौकरी कर रहे थे, तो उसी समय पंजाब के एक पुलिस अधिकारी की नज़र खली पर पडी।तब उन्होने खली को 1993 में पंजाब पुलिस में शामिल करवाया। दलीप सिंह ने 27 फरवरी, 2002 को हरमिंदर कौर से शादी की। उनकी शादी के तुरंत बाद, दलीप सिंह के कुश्ती करियर को भी काफी बुस्ट मिला। हरमिंदर के साथ अपनी शादी के सिर्फ पांच साल बाद, उन्होंने द ग्रेट खली के नाम से डब्ल्यूडब्ल्यूई में अपनी शुरुआत की थी। फरवरी 2014 में, द ग्रेट खली और उनकी पत्नी, हरमिंदर कौर ने अपने जीवन में एक बच्ची का स्वागत किया था, और उसके आगमन ने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया था। उन्होने अपनी बेटी का नाम अवलीन राणा रखा। खली अत्यंत धार्मिक हैं। वे हर दिन ध्यान करते हैं और शराब और तंबाकू से दूर रहते हैं। वे भारतीय आध्यात्मिक गुरु आशुतोष महाराज के शिष्य हैं। खली को शाकाहारी भोजन पसंद है, लेकिन वे मांस भी खाते हैं। खली का 26 जुलाई 2012 को पिट्यूटरी ग्रंथि पर एक ट्यूमर के कारण मस्तिष्क की सर्जरी भी हो चुकी है। खली 20 फरवरी 2014 को एक अमेरिकी नागरिक बन गए। फरवरी 2015 में, खली ने पंजाब में अपना कुश्ती स्कूल, कॉन्टिनेंटल रेसलिंग एंटरटेनमेंट खोला, जिसने 12 दिसंबर 2015 को अपना पहला कार्यक्रम आयोजित किया। फरवरी 2016 में, उन्होंने CWE वर्ल्ड हैवीवेट चैम्पियनशिप जीती। वे 10 फरवरी 2022 को भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये। 📽️ (2005) द लॉन्गेस्ट यार्ड (2008) गेट स्मार्ट (2010) मैकग्रबर (2010) कुश्ती (2010) रामा : द सेवियर (2012) हौबा! ऑन द ट्रेल ऑफ मार्सुपिलामी
प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक पटकथा लेखक मधुर भंडारकर के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं जन्म की तारीख और समय: 26 अगस्त 1968
मधुर भंडारकर फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और निर्माता हैं। वह फिल्म जगत में चांदनी बार, पेज 3, ट्रैफिक सिग्नल और फैशन जैसी सरीखी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उन्हें ट्रैफिक सिग्नल के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
मधुर हिंदू भगवान सिद्धिविनायक के बड़े भक्त हैं और खार में जब भी वे शहर में होते हैं अपने निवास से बिना चप्पल के मंगलवार को प्रभादेवी के मंदिर जाते हैं। उनके अनुसार फिल्म कॉर्पोरेट सबसे मुश्किल फिल्म थी क्योंकि अपनी पिछली फिल्म में पेज 3 संस्कृति को उघाड़ने के कारण कॉर्पोरेट लोगों ने उन्हें दूर ही रखना चाहा. पेप्सी – कोक विवाद से उन्होंने फिल्म कॉर्पोरेट की प्रेरणा ली. उनके कॉर्पोरेट फिल्म के बाद उन्हें विभिन्न मैनेजमेंट छात्रों के सामने कॉर्पोरेट मुद्दों पर लेक्चर के लिए आमंत्रित किया गया, हालांकि उन्होंने स्नातक की भी डिग्री हासिल नहीं की है। (26 नवम्बर 2008 को आईबीएन लोकमत टीवी चैनल पर साक्षात्कार में)
भंडारकर ने मुंबई में 15 दिसम्बर 2003 को अपनी प्रेमिका रेणु नंबूदिरी भंडारकर से शादी की। उनकी एक बेटी है जिसका नाम सिद्धि है। एशियाई फिल्म और टेलीविजन अकादमी, नोएडा के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म और टेलीविजन रिसर्च सेंटर के मधुर आजीवन सदस्य हैं।
मधुर का बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत बतौर सहायक निर्देशक के रूप में की। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में सफलता 2001 में फिल्म चांदनी बार से मिली। इस फिल्म में तब्बू अतुल कुलकर्णी ने अभिनय किया किया था। फिल्म की समीक्षकों द्वारा काफी प्रशंसा की गई। इस फिल्म की सफलता ने उन्हें हिंदी सिनेमा के टॉप निर्देशकों में शुमार कर दिया। उन्हें इस फिल्म के लिए प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उसके बाद पेज 3 और ट्रैफिक सिग्नल के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया।
तीन राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक मधुर भंडारकर ने हाल ही में अपनी उपलब्धियों में एक अन्य अध्याय जोड़ा. अपने अद्वितीय कार्यों के माध्यम से फिल्म निर्माण संस्कृति को बनाने और उसे आकार देने के लिए मधुर को पीएल देशपांडे पुरस्कार जिसे जेनिथ एशिया पुरस्कार के नाम से भी जाना जाता है से सम्मानित किया गया और उन्हें 21 वीं सदी के प्रथम दशक के फिल्म निर्माता के रूप में वर्णित किया गया। आशे फिल्म क्लब की रजत जयंती वर्ष पर यह पुरस्कार समारोह 8 वें ‘पुलोत्सव- कला उत्सव’ पुणे में नेशनल फिल्म आर्काइव में 16 नवम्बर को आयोजित किया गया। पीएल देशपांडे एक प्रसिद्ध लेखक, रंगमंच और फिल्म अभिनेता थे और उनके साहित्यिक कार्य आज भी महाराष्ट्र और दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रतिष्ठित हैं। उनके सम्मान में, जेनिथ एशिया पुरस्कार मधुर भंडारकर को दिया गया और समारोह के दौरान विश्व की महत्वपूर्ण 25 फिल्मों में उनकी फिल्म चांदनी बार को भी प्रदर्शित किया गया था।
इसके अलावा हाल ही में, भारत का राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार (एनएफएआई), जो कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के मंत्रालय के अंतर्गत आता है, प्रसिद्ध भारतीय फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर की सभी फिल्मों को संरक्षित किया है। चांदनी बार, पेज -3, कॉर्पोरेट, ट्रैफिक सिग्नल, फैशन और जेल, इस फिल्म निर्माता की सभी यथार्थवादी फ़िल्में हैं जिन्हें अब सरकार के अभिलेखीय भण्डार में भारतीय फिल्मों की सूची में स्थान मिला है।
भारत के राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के कार्य की प्रकृति देश में भावी पीढ़ी के लिए एक स्वस्थ फिल्म संस्कृति के प्रसार के एक केन्द्र के रूप में है और अभिनय के लिए भारतीय सिनेमा की विरासत की रक्षा है। फिल्म और सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर छात्रवृत्ति अनुसंधान को प्रोत्साहन करना भी इसके चार्टर का हिस्सा है। भारतीय सिनेमा के साथ विदेशी दर्शकों को परिचित करना भी अभिलेखागार का उद्देश्य है और दुनिया भर में इसे अधिक प्रदर्शित करना भी पुरालेख का एक और घोषित उद्देश्य है।
साल 2004 में मधुर भंडारकर पर अभिनेत्री प्रीति जैन ने कास्टिंग काउच का आरोप लगाया। उन्होंने मधुर पर फिल्म में लीड रोल और शादी करने का झांसा देकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाये हैं। हालंकि 2005 में जैन को गिरफ्तार कर लिया गया, क्योँकि उन्होंने मधुर को मारने के लिए अंडरवर्ल्ड को 70,000 दिए थे।
प्रसिद्ध फिल्में
दिल तो बच्चा है जी, जेल, फैशन, ट्रैफिक सिग्नल, कॉर्पोरेट, पेज 3,आन – मैन एट वर्क, चांदनी बार, हीरोइन
indo-canadian mudar: महान शायर अहमद फ़राज़ के यौम-ए-वफ़ात पर दिली खिराज़-ए-अकीदत 🎂अहमद फ़राज़ की पैदाइश 12 जनवरी 1931 (कुछ लोगों ने इनकी पैदाइश का साल 1934 भी बताया है) ⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 25 अगस्त 2008, इस्लामाबाद, पाकिस्तान कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जानाँ फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते झेले हैं जो दुःख तूने ‘फ़राज़’ अपनी जगह हैं पर तुम पे जो गुज़री है वो औरों से कम है घर से निकले थे कि दुनिया ने पुकारा था ‘फ़राज़’ अब जो फुर्सत मिले दुनिया से तो घर जाएँ कहीं उंगलियाँ आज तक इसी सोच में गुम हैं “फ़राज़” उसने कैसे नए हाथ को थामा होगा जब भी दिल खोल के रोए होंगे, लोग आराम से सोए होंगे वो सफ़ीने जिन्हें तूफ़ाँ न मिले, नाख़ुदाओं ने डुबोए होंगे तुम तक़ल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो ‘फ़राज़’ दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला जी में जो आती है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो कल पशेमाँ हों कि क्यों दिल का कहा माना नहीं वो ज़िन्दगी हो कि दुनिया ‘फ़राज़’ क्या कीजे कि जिससे इश्क़ करो बेवफ़ा निकलती है ज़िन्दगी पर इससे बढ़कर तंज़ क्या होगा ‘फ़राज़’, उसका ये कहना कि तू शायर है, दीवाना नहीं। बहुत अजीब है ये बंदिशें मुहब्बत की ‘फ़राज़’ न उसने क़ैद में रखा न हम फरार हुए अहमद फ़राज़ पैदाइश से हिन्दुस्तानी और विभाजन की त्रासदी की वजह से पाकिस्तानी के उन उर्दू कवियों में थे जिन्हें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बाद सब से अधिक लोकप्रियता मिली। अहमद फ़राज़ का असली नाम ‘सैयद अहमद शाह अली’ था। भारतीय जनमानस ने उन्हें अपूर्व सम्मान दिया, पलकों पर बिठाया और उनकी ग़ज़लों के जादुई प्रभाव से झूम-झूम उठा। 🎂अहमद फ़राज़ की पैदाइश 12 जनवरी 1931 (कुछ लोगों ने इनकी पैदाइश का साल 1934 भी बताया है) को पाकिस्तान के सरहदी इलाक़े में हुआ। उनके वालिद (पिता) एक मामूली शिक्षक थे। वे अहमद फ़राज़ को प्यार तो बहुत करते थे लेकिन यह मुमकिन नहीं था कि उनकी हर जिद वे पूरी कर पाते। बचपन का वाक़या है कि एक बार अहमद फ़राज़ के पिता कुछ कपड़े लाए। कपड़े अहमद फ़राज़ को पसन्द नहीं आए। उन्होंने ख़ूब शोर मचाया कि ‘हम कम्बल के बने कपड़े नहीं पहनेंगे’। बात यहाँ तक बढ़ी कि ‘फ़राज़’ घर छोड़कर फ़रार हो गए। वह फ़रारी तबियत में जज़्ब हो गई। आज तक अहमद फ़राज़ फ़रारी जी रहे हैं। कभी लन्दन , कभी न्यूयॉर्क, कभी रियाद तो कभी मुम्बई और हैदराबाद। पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू तथा फ़ारसी में एम. ए. करने के बाद पाकिस्तान रेडियो से लेकर पाकिस्तान नैशनल सेन्टर के डाइरेक्टर, पाकिस्तान नैशनल बुक फ़ाउन्डेशन के चेयरमैन और फ़ोक हेरिटेज ऑफ़ पाकिस्तान तथा अकादमी आफ़ लेटर्स के भी चेयरमैन रहे। शायरी का शौक़ बचपन से था। बेतबाजी के मुकाबलों में हिस्सा लिया करते थे। इब्तिदाई दौर में इक़बाल के कलाम से मुतास्सिर रहे। फिर आहिस्ता- आहिस्ता तरक़्क़ी पसंद तेहरीक को पसंद करने लगे। अली सरदार जाफ़री और फ़ैज़ अहमद फै़ज़ के नक्शे-कदम पर चलते हुए जियाउल हक की हुकूमत के वक्त कुछ गज़लें ऐसी कहीं और मुशायरों में उन्हें पढ़ीं कि इन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। कई साल पाकिस्तान से दूर बरतानिया, कनाडा मुल्कों में गुजारने पड़े। फ़राज़ को क्रिकेट खेलने का भी शौक़ था। लेकिन शायरी का शौक़ उन पर ऐसा ग़ालिब हुआ कि वो दौरे हाज़िर के ग़ालिब बन गए। उनकी शायरी की कई किताबें क्षय हो चुकी हैं। ग़ज़लों के साथ ही फ़राज़ ने नज़्में भी लिखी हैं। लेकिन लोग उनकी ग़ज़लों के दीवाने हैं। इन ग़ज़लों के अशआर न सिर्फ पसंद करते हैं बल्कि वो उन्हें याद हैं और महफिलों में उन्हें सुनाकर, उन्हें गुनगुनाकर फ़राज़ को अपनी दाद से नवाजते रहते हैं। 25 अगस्त 2008 को आसमाने-ग़ज़ल का ये रोशन सितारा हमेशा- हमेशा के लिए बुझ गया। साथ ही ग़ज़लों, मुशायरों और महफिलों को भी बेनूर कर गया। फ़राज़ की ही ग़ज़ल का मिसरा है – सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते जब बात उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की हो रही होती है तो हमें मीर तक़ी मीर, ग़ालिब आदि की चर्चा जरूर करनी होती है। मगर बीसवीं शताब्दी में ग़ज़ल की चर्चा हो और विशेष रूप से 1947 के बाद की उर्दू ग़ज़ल का ज़िक्र हो तो उसके गेसू सँवारने वालों में जो नाम लिए जाएँगे उनमें अहमद फ़राज़ का नाम कई पहलुओं से महत्त्वपूर्ण है। अहमद ‘फ़राज़’ ग़ज़ल के ऐसे शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को जनता में लोकप्रिय बनाने का क़ाबिले-तारीफ़ काम किया। ग़ज़ल यों तो अपने कई सौ सालों के इतिहास में अधिकतर जनता में रुचि का माध्यम बनी रही है, मगर अहमद फ़राज़ तक आते-आते उर्दू ग़ज़ल ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे और जब फ़राज़ ने अपने कलाम के साथ सामने आए, तो लोगों को उनसे उम्मीदें बढ़ीं। ख़ुशी यह कि ‘फ़राज़’ ने मायूस नहीं किया। अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साँचे में ढाल कर जो ग़ज़ल उन्होंने पेश की वह जनता की धड़कन बन गई और ज़माने का हाल बताने के लिए आईना बन गई। मुशायरों ने अपने कलाम और अपने संग्रहों के माध्यम से अहमद फ़राज़ ने कम समय में वह ख्याति अर्जित कर ली जो बहुत कम शायरों को नसीब होती है। बल्कि अगर ये कहा जाए तो गलत न होगा कि इक़बाल के बाद पूरी बीसवीं शताब्दी में केवल फ़ैज और फ़िराक का नाम आता है जिन्हें शोहरत की बुलन्दियाँ नसीब रहीं, बाकी कोई शायर अहमद फ़राज़ जैसी शोहरत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाया। उसकी शायरी जितनी ख़ूबसूरत है, उनके व्यक्तित्व का रखरखाव उससे कम ख़ूबसूरत नहीं रहा। अहमद फ़राज़ की शायरी के आलोचकों का यह भी मानना है कि अहमद फ़राज़ की शायरी की शोहरत आम होने की वजह उनकी शायरी की बाहरी सजावट और अहमद फ़राज़ का अपना सजीला व्यक्तित्व है। लेकिन पाठक को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनकी शोहरत में उनके व्यक्तित्व का कितना हाथ है, क्योंकि शायरी की दुनिया में बाहरी चमक-दमक अधिक समय तक नहीं टिकती, जबकि अहमद फ़राज़ की शायरी दशकों बाद आज भी अपनी महत्ता बरक़रार रखे हुए है। यह सही हो सकता है कि अहमद फ़राज़ को ख्याति मुशायरों से मिली, पर मुशायरों पर छाए रहने वाले कितनी ही शायर अपनी लहक और चमक खोने के बाद अतीत का हिस्सा बन गए हैं, जबकि अहमद फ़राज़ का पहले से ज़्यादा आज मौजूद होना उनकी शायरी के दमख़म का पता देता है। हिजरत यानी देश से दूर रहने की पीड़ा और अपने देश की यादें अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साथ उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें : वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है। मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है। ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है फ़राज़ की शायरी पर हिन्दुस्तान अनेक समकालीन रचनाकारों ने अपनी राय ज़ाहिर की है। मजरूह सुल्तानपुरी ने एक बार लिखा कि- ‘‘फ़राज़ अपने वतन के मज़लूमों के साथी हैं। उन्हीं की तरह तड़पते हैं, मगर रोते नहीं। बल्कि उन जंजीरों को तोड़ते और बिखेरते नजर आते हैं जो उनके माशरे (समाज) के जिस्म (शरीर) को जकड़े हुए हैं। उनका कलाम न केवल ऊँचे दर्जे का है बल्कि एक शोला है, जो दिल से ज़बान तक लपकता हुआ मालूम होता है। अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ उजड़े हु्ए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें इस से पहले के बे-वफ़ा हो जाएं क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएं दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभानेवाला वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़मानेवाला करूँ न याद अगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बरहम हैं दोस्तो अब हो चला यक़ीं के बुरे हम हैं दोस्तो कुछ आज शाम ही से है दिल भी बुझा-बुझा कुछ शहर के चिराग़ भी मद्धम हैं दोस्तो
मेरा आज का लेखभारत के अंतरिक्ष प्रोग्राम के जनक विक्रम साराभाई थे कोई नेहरू का योगदान नहीँ था 💥💪भारत (India) के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक कहे जाने वाले डॉ विक्रम साराभाई की 30 दिसंबर को पुण्यतिथि आती है. उनकी मौत बहुत सामान्य परिस्थिति में हुई थी. लेकिन जिस तरह का ओहदा था और देश के हालात थे, वे देश के अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक थे. कई बातें संदेह पैदा करती हैं कि क्या वाकई उनकी मौत सामान्य थी. ऐसे सवालों के जवाब तो नहीं मिल सके, लेकिन देश ने बहुत ही नाजुक मौके पर अपना महान वैज्ञानिक को जरूर खो दिया था. आज भारत की वैज्ञानिक उन्नति के बारे में बात करते हुए इसरो का जिक्र ना करना विषय को अधूरा ही रखना है. पिछले कई दशकों से इसरो ने ऐसी उपलब्धियां हासिल की हैं जो दुनिया में किसी देश को हासिल नहीं है. लेकिन इसरो जैसी संस्था की अवधारणा इसकी स्थापना के कई साल पहले ही इसके संस्थापक और भारत के महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई ने पूरी कर ली थी. आज देश उन्हें उनकी पुण्यतिथि पर याद जरूर करने लगा है. उनकी मृत्यु के समय की स्थितियां बहुत सामान्य सी थीं, उस वक्त देश में महौल ऐसा था कि डॉ साराभाई की मौत से कई तरह के सवाल पैदा हो गए थे। कैसे थे उनकी मौत के समय के हालात। आगे बता रहा हू ध्यान देना 30 दिसंबर 1971 को हमारा देश पाकिस्तान को युद्ध में परास्त कर चुका था और उस समय बंगलादेश एक नया राष्ट्र बन चुका था।भारत परमाणु अप्रसार संधि पर विचार कर रहा था. लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि अगले दिन अखबार यह दुखद समाचार देश भर को दे रहे होंगे कि डॉ विक्रम साराभाई की मौत हो गई है. तिरुवनंतपुरम में हुई थी डॉ साराभाई की मौत तिरुवनंतपुरम के कोवलम बीच के उनके पसंदीदा रिसॉर्ट में हुई थी. उस समय उन्हों ने रूसी रॉकेट का प्रक्षेपण देखा था और थुम्बा रेलवे स्टेशन का उद्घाटन करने के बाद आराम कर रहे थे, जिसके बाद वे तिरुवनंतपुरम से बंबई रवाना होने वाले थे. उनकी कलाम से भी हुई थी बातचीत 30 दिसंबर को ही साराभाई को स्पेस लॉन्च व्हीकल की डिजाइन की समीक्षा भी करनी थी. रवाना होने से एक घटें पहले उन्हें डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से टेलीफोन से बातचीत की थी और इस बातचीत के एक ही घंटे के भीतर 52 साल के साराभाई की मौत हो गई थी. बताया जाता है कि उनकी मौत हृदयाघात से हुई थी. लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनके जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की मौत की भी कोई जांच नहीं की गई थी. उनके नजदीकी सहयोगी पद्मनाभन जोशी बताते हैं कि फ्लाइट में उनके पास वाली सीट भी हमेशा खाली रखी जाती थी. और यदि किसी वजह से उन्हें ट्रेन से यात्रा करनी पड़ती थी तो एक पूरी टीम उनके साथ रखी जाती थी.पहले से बीमार भी नहीं थे डॉ साराभाई अपनी मौत के एक दिन पहले तक डॉ साराभाई ने मशहूर आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरिया से समुद्र में उनके साथ तैरने का वादा किया था, जो उस समय कोवलम पैलेस पर काम कर रहे थे. इसके बाद वैज्ञानिकों से मिलते और फिर उन्हें अपने परिवार के साथ नया साल मनाने के लिए अहमदाबाद के लिए बंबई से होते हुए रवाना होना था. अब प्रश्न उठता है कि पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ? डॉ साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई ने अपने पिता पर लिखी किताब में लिखा है कि “हमें उनका पोस्टमार्टम कराने का कोई कारण दिखाई नहीं दिया.” वहीं उनके पुत्र कार्तिकेय साराभाई का कहना था कि पोस्टमार्टम ना कराने का फैसला उनकी दादी डॉ साराभाई की मां का था. मौत से पहले विक्रम साराभाई को किसी भी तरह की स्वास प्रॉब्लम भी नही थी 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में पैदा होने वाले साराभाई के प्रयासों से ही 1969 में भारत के इसरो की स्थापना हुई. वे इसरो के पहले चेयरमैन थे. नेहरू नही विक्रम साराभाई ने ही भारत सरकार को इस बात के लिए मनाया कि भारत अपना खुद का अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करे. उनके योगदान के कारण ही उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक या पिता कहा जाता है.
अंजलि देवी 🎂जन्म 24 अगस्त 1927 पेद्दापुरम, पूर्व गोदावरी जिला, मद्रास प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत मौत ⚰️13 जनवरी 2014 (उम्र 86) चेन्नई, तमिलनाडु, भारत पेशा अभिनेत्री मॉडल जीवनसाथी ↔️पी॰ अदिनारायणा राव (🎂1948-⚰️1991; उनकी मृत्यु) 13 जनवरी 2014 को 86 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई । कई अंगों की विफलता के कारण चेन्नई के विजया अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई ।
कल्याणजी (संगीतकार) कल्याणजी पूरा नाम कल्याणजी वीरजी शाह प्रसिद्ध नाम कल्याणजी 🎂जन्म 30 जून, 1928 जन्म भूमि कच्छ, गुजरात ⚰️मृत्यु 24 अगस्त, 2000 अभिभावक पिता- वीरजी शाह कर्म भूमि भारत कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा मुख्य रचनाएँ ‘उपकार’, ‘छलिया’, ‘हिमालय की गोद में’, ‘पूरब-पश्चिम’, ‘सट्टा बाज़ार’, ‘सच्चा झूठा’ तथा ‘जॉनी मेरा नाम’ आदि। पुरस्कार-उपाधि 1968 तथा 1974 में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ तथा ‘फ़िल्म फेयर पुरस्कार’, ‘पद्मश्री’ (1992) प्रसिद्धि संगीतकार नागरिकता भारतीय संबंधित लेख कल्याणजी आनंदजी, हेमंत कुमार, सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, नौशाद अन्य जानकारी कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। कल्याणजी वीरजी शाह जन्म- 30 जून, 1928, कच्छ, गुजरात; मृत्यु- 24 अगस्त, 2000) हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार थे। वे भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी ‘कल्याणजी आनंदजी’ में से एक थे। कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। भारतीय फ़िल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय कल्याणजी को ही जाता है। वर्ष 1992 में संगीत के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया था। जन्म कल्याणजी का जन्म 30 जून, सन 1928 ई. में गुजरात के कच्छ ज़िले में कुण्डरोडी नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम वीरजी शाह था। कल्याणजी बचपन से ही संगीतकार बनने का सपना देखा करते थे; हालांकि उन्होंने किसी उस्ताद से संगीत की शिक्षा नहीं ली थी। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिये वे बाद में मुंबई आ गए थे। संगीत की दुनिया से जुड़ाव हिन्दी फ़िल्म जगत् की सफल संगीतकार जोड़ियों में से एक कल्याणजी आनंदजी अपनी किराने की दुकान पर नून तेल बेचते हुए ही जिंदगी गुजार देते, अगर एक तंगहाल ग्राहक ने उधारी चुकाने के बदले दोनों को संगीत की तालीम देने की पेशकश न की होती। वीरजी शाह का परिवार कच्छ से मुंबई आ गया था और आजीविका चलाने के लिए किराने की दुकान खोल ली। एक ग्राहक दुकान से सामान तो लेता था, लेकिन पैसे नहीं चुका पाता था। वीरजी ने एक दिन जब उससे तकाजा किया तो उसने उधारी चुकाने के लिए वीरजी के दोनों बेटों कल्याणजी और आनंदजी को संगीत सिखाने का जिम्मा संभाला और इस तरह उधारी के पैसे से एक ऐसी संगीतकार जोड़ी की नींव पड़ी, जिसने अपने संगीत से हिन्दी फ़िल्म जगत् को हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लिया। हालाँकि उधारी के संगीत के उन गुरुजी को सुर और ताल की समझ कुछ खास नहीं थी, लेकिन उन्होंने वीरजी के पुत्रों कल्याणजी और आनंदजी में संगीत की बुनियादी समझ ज़रूर पैदा कर दी। इसके बाद संगीत में दोनों की रुचि बढ़ने लगी और दोनों भाई संगीत की दुनिया से जुड़ गए। हेमंत कुमार के सहायक कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। भारतीय फ़िल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय भी कल्याणजी को ही जाता है। कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी ने लगातार तीन दशकों 1960, 1970 और 1980 तक हिन्दी सिनेमा पर राज किया। कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी के नाम से अपना ऑर्केस्ट्रा ग्रुप शुरू किया और मुंबई तथा उससे बाहर अपने संगीत शो आयोजित करने लगे। इसी दौरान वे फ़िल्म संगीतकारों के संपर्क में भी आए। इसके बाद दोनों भाई हिन्दी फ़िल्म जगत् के उस क्षेत्र में पहुँच गए, जहाँ सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, हेमंत कुमार, नौशाद और रवि जैसे संगीतकारों के नाम की तूती बोलती थी। शुरू में कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी शाह के नाम से फ़िल्मों में संगीत देना शुरू किया और ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ (1959) उनके संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी। इसी साल आनंदजी भी उनके साथ जुड़ गए और कल्याणजी आनंदजी नाम से एक अमर संगीतकार जोड़ी बनी। कल्याणजी आनंदजी ने 1959 में फ़िल्म ‘सट्टा बाज़ार’ और ‘मदारी’ का संगीत दिया, जबकि 1961 में ‘छलिया’ का संगीत दिया। फ़िल्म ‘छलिया’ में उनके संगीत से सजा गीत “डम डम डिगा डिगा” और “छलिया मेरा नाम” श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय हैं। वर्ष 1965 में प्रदर्शित संगीतमय फ़िल्म ‘हिमालय की गोद में’ की सफलता के बाद कल्याणजी-आनंदजी शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे। मनोज कुमार की फ़िल्म ‘उपकार’ में उन्होंने ‘कसमे वादे प्यार वफा’ जैसा दिल को छू लेने वाला संगीत देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इसके अलावा मनोज कुमार की ही फ़िल्म ‘पूरब और पश्चिम’ के लिए भी कल्याणजी ने ‘दुल्हन चली वो पहन चली तीन रंग की चोली’ और ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’ जैसा सदाबहार संगीत देकर अलग ही समां बांध दिया। 1970 में विजय आनंद निर्देशित फ़िल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ में ‘नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं’ और ‘पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले’ जैसे गीतों के लिए रूमानी संगीत देकर कल्याणजी-आनंदजी ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। मनमोहन देसाई के निर्देशन में फ़िल्म ‘सच्चा झूठा’ के लिये कल्याणजी-आनंदजी ने बेमिसाल संगीत दिया। ‘मेरी प्यारी बहनियाँ बनेगी दुल्हनियाँ’ को आज भी शहरों और देहातों में विवाह आदि के मौके पर सुना जा सकता है। पुरस्कार तथा सम्मान वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘सरस्वती चंद्र’ के लिए कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ के साथ-साथ ‘फ़िल्म फेयर पुरस्कार’ भी दिया गया। इसके अलावा 1974 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कोरा काग़ज़’ के लिए भी कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का ‘फ़िल्म फेयर पुरस्कार’ मिला। कल्याणजी ने अपने सिने करियर में लगभग 250 फ़िल्मों में संगीत दिया। वर्ष 1992 में संगीत के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। निधन लगभग चार दशक तक अपने जादुई संगीत से श्रोताओं को भावविभोर करने वाले कल्याणजी 24 अगस्त, 2000 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने भारत ने मेरे भारत ने दुनिया को तब गिनती आयी तारों की भाषा भारत ने दुनिया को पहले सिखलायी देता ना दशमलव भारत तो यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था धरती और चाँद की दूरी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था सभ्यता जहाँ पहले आयी पहले जनमी है जहाँ पे कला अपना भारत वो भारत है जिसके पीछे संसार चला संसार चला और आगे बढ़ा यूँ आगे बढ़ा, बढ़ता ही गया भगवान करे ये और बढ़े बढ़ता ही रहे और फूले-फले है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहाँ के गाता हूँ भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ काले-गोरे का भेद नहीं हर दिल से हमारा नाता है कुछ और न आता हो हमको हमें प्यार निभाना आता है जिसे मान चुकी सारी दुनिया मैं बात वो ही दोहराता हूँ भारत का रहने… जीते हो किसी ने देश तो क्या हमने तो दिलों को जीता है जहाँ राम अभी तक है नर में नारी में अभी तक सीता है इतने पावन हैं लोग जहाँ मैं नित-नित शीश झुकाता हूँ भारत का रहने… इतनी ममता नदियों को भी जहाँ माता कह के बुलाते है इतना आदर इन्सान तो क्या पत्थर भी पूजे जातें है इस धरती पे मैंने जनम लिया ये सोच ये सोच के मैं इतराता हूं भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हू
के. के. (गायक) कृष्णकुमार कुन्नथ पूरा नाम कृष्णकुमार कुन्नथ प्रसिद्ध नाम केके 🎂जन्म 23 अगस्त, 1968 जन्म भूमि केरल ⚰️मृत्यु 31 मई, 2022 मृत्यु स्थान कोलकाता अभिभावक माता- कनाकवाल्ली पिता- सी. एस. नायर पति/पत्नी ज्योति संतान पुत्र- नकुल पुत्री- जन्म- 23 अगस्त, 1968, केरल; मृत्यु- 31 मई, 2022, कोलकाता) प्रसिद्ध भारतीय पार्श्वगायक थे। उन्हें उनके संक्षिप्त नाम ‘केके’ से अधिक जाना जाता था। वह हिंदी, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और तमिल फिल्मों में प्रमुख गायक रहे। केके ने अपने दोस्तों के साथ एक रॉक बैंड का भी गठन किया था। मशहूर गायक किशोर कुमार और संगीत निर्देशक आर. डी. प्रधान ने केके को बहुत प्रभावित किया था। विख्यात फिल्म निर्देशक विशाल भरद्वाज ने केके को बॉलीवुड में गाने का पहला मौका दिया था। उन्होंने बॉलीवुड में अपना कार्यकाल फ़िल्म ‘माचिस’ के ‘छोड़ आये हम वो गलियाँ’ से शुरू किया। केके 31 मई, 2022 की आधी रात को कोलकाता के नजरुल मंच पर परफॉर्म कर रहे थे कि अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी और कुछ ही पलों में उनकी मौत हो गई। परिचय कृष्णकुमार कुन्नथ उर्फ़ केके का जन्म 23 अगस्त, 1968 को केरल में हुआ था। उनके पिता का नाम सी. एस. नायर और माता का कनाकवाल्ली है। हिंदी सिनेमा में एंट्री लेने से पहले ही केके करीबन 35000 ऐड जिंगल्स कर चुके थे। उन्होंने 1999 क्रिकेट विश्व कप के दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के समर्थन के लिए ‘जोश ऑफ़ इंडिया’ गाना गाया। इसके बाद उन्होंने ‘पल’ नामक एलबम निकाला जिसे सर्वश्रेष्ठ सोलो एल्बम के लिए स्टार स्क्रीन पुरस्कार मिला। इस एल्बम के दो गाने ‘पल’ और ‘यारों’ काफी लोकप्रिय थे। शिक्षा केके का पूरा बचपन दिल्ली में बीता। उन्होंने दिल्ली के माउंट सेंट मैरी स्कूल शुरुआती शिक्षा पूरी की। उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन दिल्ली विश्वविद्यालय के करोड़ीमल कॉलेज से पूरी की थी। विवाह साल 1991 में उन्होंने अपनी बचपन की दोस्त ज्योति से शादी रचाई। केके एक बहुत ही जिम्मेदार व्यक्ति थे। जब भी उनके पास वक्त होता वो वह अपने परिवार के साथ रहते थे। एक इंटरव्यू के दौरान केके ने कहा था, “मेरा परिवार ही मेरी ताकत है, वो मुझे हर कजोरी से लड़ने की ताकत देता है।” उनके एक बेटा और बेटी हैं। उनका बीटा नकुल जिसने एल्बम ‘हमसफ़र’ में एक गीत मस्ती गाया है। केके की एक बेटी भी है जिसका नाम तामारा है। कॅरियर केके कभी भी एक गायक नहीं बनना चाहते थे, उनका बचपन से सपना डॉक्टर बनने का था। केके किशोर कुमार, आर. डी. बर्मन को अपना गुरु मानते थे और उन्हीं को ध्यान में रखकर संगीत को अपना कॅरियर बनाया। कॉलेज के दिनों के दौरान उन्होंने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक बैंड किया था। केके को पहला ब्रेक यूटीवी ने दिया था। उन चार सैलून की अवधि में केके ने 11 भारतीय भाषाओं में 3,500 से अधिक विज्ञापनों में काम किया। केके लेस्ली लेविस को अपना गुरु मानते थे, क्योंकि, उन्होंने ही केके को पहली बार विज्ञापन में गाने का मौका दिया था। केके ने हिंदी में 250 से भी अधिक गाने गाये एवं तमिल और तेलुगु में 50 से भी अधिक गाने गाये। विख्यात फिल्म निर्देशक विशाल भरद्वाज ने केके को बॉलीवुड में गाने का पहला मौका दिया। उन्होंने बॉलीवुड में अपना कार्यकाल फ़िल्म ‘माचिस’ के ‘छोड़ आये हम’ से शुरू किया और आगे चलकर कई और लोकप्रिय गाने गाये। उन्हें अपना पहला सोलो गाना भी विशाल भरद्वाज ने ही दिया। पर यह ‘हम दिल दे चुके सनम’ के ‘तड़प तड़प के’ में उनका भावपूर्ण गायन ही था जिससे उन्हें प्रसिद्धि मिली। टीवी कॅरियर साल 1999 में सोनी म्यूजिक लॉन्च हुआ तो वे एक नए गायक को लॉन्च करना चाहते थे। इस काम के लिए केके को चयनित किया गया। उस दौरान उन्होंने ‘पल’ नमक एक सोलो एल्बम निकाला जिसके संगीत निर्देशक लेस्ली लेविस थे। उनका दूसरा एल्बम ‘हमसफ़र’ 24 जनवरी 2008 को रिलीज किया गया। केके सिंगिंग बेस्ड शो फेम गुरुकुल में बतौर जज नज़र आ चुके थे। हालंकि वह इसके बाद दुबारा छोटे शो में नज़र नहीं आये। उनका कहना था कि यह माध्यम उन्हें प्रतिबंधित रखती है। प्रसिद्ध गाने पल, तड़प-तड़प के इस दिल से, सच कह रहा है दीवाना, आवारापन बंजारापन, आशाएं, तू ही मेरी शब है, क्या मुझे प्यार है, लबों को, जरा सा, खुदा जानें, दिल इबादत, है जूनून, जिंदगी दो पल की, मै क्या हूँ, हां तू है, अभी-अभी, तुझे सोचता हूँ, इंडिया वाले, तो जो मिला। ⚰️मृत्यु गायक केके की मृत्यु 21 मई, 2022 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुई। एक कॉलेज द्वारा दक्षिण कोलकाता स्थित नजरुल मंच में एक समारोह का आयोजन किया गया था। जहाँ करीब एक घंटे तक गाने के बाद जब केके वापस अपने होटल पहुंचे तो वह अस्वस्थ महसूस कर रहे थे। उनको दक्षिण कोलकाता के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था कि ‘केके को रात करीब 10 बजे अस्पताल लाया गया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम उनका उपचार नहीं कर सके।’ अस्पताल के चिकित्सकों ने कहा कि उन्हें आशंका है कि गायक की मौत हार्ट अटैक के कारण हुई थी।
सायरा बानोजन्म23 अगस्त, 1944जन्म भूमिभारतअभिभावकमाँ- नसीम बानोपति/पत्नीदिलीप कुमारकर्म भूमिमुम्बईकर्म-क्षेत्रअभिनेत्रीमुख्य फ़िल्मेंजंगली, हेरा फेरी, पड़ोसन, गोपी, विक्टोरिया नं 203नागरिकताभारतीयअन्य जानकारी17 साल की उम्र में ही सायरा बानो ने बॉलीवुड में कॅरियर की शुरुआत कर दी थी। सन 1961 में वह शम्मी कपूर के साथ फ़िल्म ‘जंगली’ में पहली बार पर्दे पर नजर आईं।
सायरा बानो जन्म: 23 अगस्त, 1944) हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं। बॉलीवुड में ऐसे कई सितारे हैं, जो बेशक बॉक्स-ऑफिस के लिहाज से औसत हों पर जब बात दर्शकों के बीच पैठ जमाने की हो तो वह सबसे आगे होते हैं, ऐसी ही एक अदाकारा हैं सायरा बानो। अपने समय की सबसे ख़ूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक सायरा बानो को लोग उनकी अदाकारी कम और उनकी ख़ूबसूरती के लिए ज्यादा पहचानते हैं।
जीवन परिचय
सायरा बानो का जन्म 23 अगस्त, 1944 को हुआ था। उनकी माँ अभिनेत्री नसीम बानो भी अपने समय की मशहूर अभिनेत्री रही हैं। उनका अधिकतर बचपन लंदन में बीता, जहां से पढ़ाई खत्म करके वह भारत लौटीं। स्कूल से ही उन्हें अभिनय से लगाव था और स्कूल में भी उन्हें अभिनय के लिए कई पदक मिले थे।
सायरा बानो के बारे में विस्तार से जाने के पहले तीस के दशक की ग्लैमरस नायिका नसीम बानो को जानना ज़्यादा ज़रूरी है। उस दौर में फ़िल्मों में आने वाली लड़कियाँ प्रायः निचले तबकों से हुआ करती थी। ऊँचे-रईस खानदान की नसीम ने जब फ़िल्मों में आने की जिद की, तो परिवार का विरोध झेलना पड़ा। लेकिन सोहराब मोदी जैसे निर्माता-निर्देशक ने नसीम को फ़िल्म हेमलेट में ओफिलिया के रोल का ऑफर दिया, तो सबका गुस्सा काफूर हो गया। नसीम की किस्मत जागी फ़िल्म ‘पुकार’ से। जहाँगीर के न्याय पर आधारित इस फ़िल्म में नसीम ने नूरजहाँ का किरदार चन्द्रमोहन के साथ निभाया था। अपनी ही आवाज गाना भी गाया था- ‘ज़िंदगी का साज भी क्या साज है, बज रहा है और बेआवाज है।’ नसीम तीस के दशक की तमाम तारिकाओं में सबसे अधिक हसीन और शोख थी। इसीलिए उन्हें ब्यूटी-क्वीन के नाम से प्रचारित किया जाता था। जब सायरा बानो को फ़िल्मों में लांच किया गया, तो माँ का ताज उनके सिर पर रखा गया। नसीम बानो की उल्लेखनीय फ़िल्मों में चल-चल रे नौजवान, उजाला, बेगम और चाँदनी रात प्रमुख हैं।
17 साल की उम्र में ही सायरा बानो ने बॉलीवुड में अपने कॅरियर की शुरुआत की। 1961 में वह शम्मी कपूर के साथ फ़िल्म ‘जंगली’ में पहली बार पर्दे पर नजर आईं। फ़िल्म बहुत हिट रही और इसने सायरा बानो को भी बॉलीवुड में अच्छी शुरुआत दिलाई। इस फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फ़िल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। इसके बाद सायरा बानो ने कई हिट फ़िल्मों में काम किया। 60 और 70 के दशक में सायरा बानो एक सफल अभिनेत्री की तरह बॉलीवुड में जगह बना चुकी थीं। लेकिन साल 1968 की फ़िल्म ‘पड़ोसन’ ने उन्हें दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। इस एक फ़िल्म ने उनके कैरियर के लिए टर्निग-प्वॉइंट का काम किया। इसके बाद उन्होंने ‘गोपी’, ‘सगीना’, ‘बैराग’ जैसी हिट फ़िल्मों में अपने पति दिलीप कुमार के साथ काम किया। ‘शागिर्द’, ‘दीवाना’, ‘चैताली’ (Chaitali) जैसी फ़िल्मों में सायरा बानो का अभिनय बहुत अच्छा रहा।
जंगली (1961)
शादी (1962)
ब्लफ़ मास्टर (1963)
दूर की आवाज (1964)
आई मिलन की बेला (1964)
एप्रिल फूल (1964)
ये ज़िंदगी कितनी हसीन है (1966)
प्यार मोहब्बत (1966)
शागिर्द (1966)
दीवाना (1967)
अमन (1967)
पड़ोसन (1968)
झुक गया आसमान (1968)
आदमी और इंसान (1969)
पूरब और पश्चिम (1970)
गोपी (1970)
बलिदान (1971)
विक्टोरिया नं. 203 (1972)
दामन और आग (1973)
आरोप (1973)
ज्वार भाटा (1973)
सगीना (1974)
रेशम की डोरी (1974)
पैसे की गुड़िया (1974)
साजिश (1975)
चैताली (1975)
आखरी दाँव (1975)
जमीर (1975)
कोई जीता कोई हारा (1976)
बैराग (1976)
आरंभ (1976)
हेरा फेरी (1976)
मेरा वचन गीता की कसम (1977)
काला आदमी (1978)
देश द्रोही (1980)
दुनिया (1984)
फैसला (1988)
सायरा और राजेन्द्र कुमार
पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी एवं बॉलीवुड के कलाकारों के साथ सायरो बानो
सन् 1960 के दशक में सायरा की कई सुपरहिट फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने लगी थी। उन दिनों राजेन्द्र कुमार को जुबिली कुमार के नाम से पुकारा जाने लगा था। राजेन्द्र के अभिनय में दिलीप साहब की पूरी परछाई समाई हुई थी। सायरा का दिल राजेन्द्र पर फिदा हो गया, जबकि वे तीन बच्चों वाले शादीशुदा व्यक्ति थे। माँ नसीम को जब यह भनक लगी, तो उन्हें अपनी बेटी की नादानी पर बेहद गुस्सा आया। उन्हीं दिनों उन्होंने दिलीप कुमार के पाली हिल वाले बंगले के पास ज़मीन ख़रीदकर घर बनवा लिया था। सायरा का दिलीप के घर आना-जाना और बहनों से मेल-मिलाप जारी था। नसीम ने पड़ोसी दिलीप साहब की मदद ली और उनसे कहा कि सायरा को वे समझा दें ताकि राजेन्द्र कुमार से पीछा छूटे। बेमन से दिलीप कुमार ने यह काम किया क्योंकि वे सायरा के बारे में ज्यादा जानते भी नहीं थे और शादी का तो दूर-दूर तक इरादा नहीं था। जब दिलीप साहब ने सायरा को समझाया कि राजेन्द्र के साथ शादी का मतलब है पूरी ज़िंदगी सौतन बनकर रहना और तकलीफें सहना। तब पलटकर सायरा ने दिलीप साहब से सवाल किया कि क्या वे उससे शादी करेंगे? सवाल से अचकचाए दिलीप उस समय तो कोई जवाब नहीं दे पाए।
विवाह
बॉलीवुड में जब भी प्रेम कहानियों और रोमांटिक जोड़ियों की बात आती है तो सायरा बानो और दिलीप कुमार का ज़िक्र ज़रूर होता है। दोनों की मुलाकात, प्यार और फिर शादी की कहानी बिल्कुल फ़िल्मी हैं। सायरा बानो ने 1966 में 22 साल की उम्र में दिलीप कुमार से शादी की थी और उस समय दिलीप कुमार खुद 44 साल के थे। दूल्हे दिलीप कुमार की घोड़ी की लगाम पृथ्वीराज कपूर ने थामी थी और दाएँ-बाएँ राज कपूर तथा देव आनंद नाच रहे थे।उम्र का यह फासला कभी भी इन दोनो के प्यार के मध्य नहीं आया।